भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 800 में से

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२०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनादिखस्थैस्त्रिमदायगैर्वा चतुर्थरन्ध्रव्ययसंस्थितैर्वा। नभस्तलस्थैर्हलनाम योगः किलोदितोऽयं निखिलागमज्ञैः ॥१०॥ सभी ग्रह २, ६, १०, ३, ७, ११, ४, ८, १२ हों तो 'हल' नाम का योग होता है॥१०॥ लग्नस्मरस्थानगतैः शुभाख्यैः पापैश्च मेषूरणबन्धुयातैः । वज्राभिधस्तैर्विपरीतसंस्थैर्यवश्च मिश्रैः कमलाभिधानः ॥११॥ शुभग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों और पापग्रह दशम और चतुर्थ भाव में हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यानि १, ७ भाव में पापग्रह और ४, १० भाव में शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है। यदि सभी केंद्रों में मिश्रित शुभ-पाप ग्रह बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥११॥ त्यक्त्वा केन्द्राणि चेत्खेटाः शेषस्थानेषु संस्थिताः । वापीयोगो भवेदेवं गदितः पूर्वसूरिभिः ॥१२॥ यदि केंद्र से भिन्न स्थान (पणफर) में सभी ग्रह हों तो (वापी) योग होता है॥१२॥ लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्याच्चतुर्गृहस्थैर्गगनेचरेन्द्रैः । क्रमेण यूपश्च शरश्च शक्तिर्दण्डः प्रदिष्टः खलु जातकज्ञैः ॥१३॥ सभी ग्रह लग्न से चौथे भाव के अंदर ही हों तो 'यूप' योग होता है। सभी ग्रह लग्न से चौथे से सप्तम के अन्दर हों तो 'शर' योग होता है। सभी ग्रह सप्तम से दशम के अंदर हों तो 'शक्ति' योग होता है। सभी ग्रह दशम से लग्न के अंदर हों तो 'दंड' योग होता है ॥१३॥ लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्यात्सप्तर्क्षगैर्नौरथकूटसंज्ञः । छत्रं धनुश्चान्यगृहप्रवृत्तैर्नोपूर्व कैर्योग इहार्थचन्द्रः ॥१४॥ तनोर्धनाद्यैकगृहान्तरेण स्युः स्थानषट्के गगनेचरेन्द्राः । चक्राभिधानश्च समुद्रनामा योगा इतीहाकृतिजाश्च विंशत् ।।१५।। सभी ग्रह लग्न से सातवें भाव के अंदर हों तो 'नौका' योग होता है। सभी ग्रह चतुर्थ से दशम भाव के अंदर सात घरों में हो तो 'कूट' योग होता है। सभी ग्रह सप्तम से लग्न पर्यत सात भावों में हो तो 'छल' योग होता है। सभी ग्रह दशम से चतुर्थ भाव के अंदर सात भावों में हों तो 'चाप' योग होता है। इससे अतिरिक्त भावों में ग्रह हों तो 'अर्धचंद्र' योग होता है।।१४-१५।।