भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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२०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तो शुभकर्त्तरी होती है। शुभ योग वा शुभ कर्त्तरी हो तो जातक बुद्धिमान्, रूप, शील, गुण से युक्त होता है। पापग्रह से उत्पन्न योग हो तो जातक कामी, पापकर्म करने वाला होता है।।५-६।। अथ पर्वतयोगस्तत्फलं चाह— सौम्येषु केन्द्रगृहगेषु सप्तनरंध्रे शुद्धेऽथवा शुभयुते यदि पर्वतः स्यात्। लग्नान्त्यपौ यदि परस्परकेन्द्रयातौ मित्रेक्षितौ भवति पर्वतनामयोगः ।।७।। भाग्यान्वितः पर्वतयोगजातो विद्याविनोदाभिरतः प्रदाता। कामो परस्त्रीजनकेलिलोलस्तेजो यशस्वी पुरनायकः स्यात् ।।८।। यदि सातवें, आठवें भाव में कोई ग्रह न हो अथवा शुभग्रह से युत हो और केन्द्रों में शुभग्रह हों तो पर्वत योग होता है। लग्नेश और व्ययेश केन्द्र में हों और मित्रग्रह से देखे जाते हों तो पर्वत योग में उत्पन्न पुरुष भाग्यवान्, विद्वान् और दाता होता है।।७-८।। अथ काहलयोगस्तत्फलं चाह— अन्यो ऽन्यकेन्द्रगृहगौ गुरुबन्धुनाथौ लग्नाधिपे बलयुते यदि काहलः स्यात् । कर्मेश्वरेण सहिते तु विलोकिते वा स्वोच्चे स्वके सुखपतौ यदि काहलः स्यात् ।।९।। ओजस्वी साहसी मूर्खश्चतुरङ्गबलैर्युतः। यत्किञ्चिद् ग्रामनाथस्तु काहले जायते नरः ।।१०।। गुरु और चतुर्थेश परस्पर केन्द्र में हों और लग्नेश बली हो तो काहल योग होता है। यदि सुखेश अपने उच्च या अपनी राशि का होकर कर्मेश से युत हो तो काहल योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष तेजस्वी, साहसी, मूर्ख, सेवा के बल से युक्त, कुछ ग्रामों का स्वामी होता है।।९- १०।। अथ चामरयोगस्तत्फलं चाह— लग्नेश्वरे केन्द्रगते स्वतुंगे जीवेक्षिते चामरनामयोगः। सौम्यद्वये लग्नगृहे कलत्रे नवास्पदे वा यदि चामरः स्यात् ।।११।। योगे जातश्चामरे राजपूज्यो विद्वान् वाग्मी पंडितो वा महीपः। सर्वज्ञः स्याद्वेदशास्त्राधिकारी जीवेल्लोके सप्ततिर्वत्सराणाम् ।।१२।।