बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनेकयोगाध्यायः २०७ इन योगों का फल सभी ग्रहों की दशा में होता है, यह पूर्वजों का निर्णय है।।४९।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे नाभसयोगाध्यायः चतुर्दशः ।।१४।। अथानेकयोगाध्यायः अथ गजकेसरीयोगस्तत्फलं चाह- केन्द्रस्थिते देवगुरौ शशाङ्काद्योगस्तदाहुर्गजकेसरीति । दृष्टे सितार्येन्दुसुतैः शशाङ्के नीचास्तहीनैर्गजकेसरीति ।।१।। चन्द्रमा से केन्द्र में गुरु हो तो गजकेसरी योग होता है और चन्द्रमा नीच- अस्तादि में न गये हुए शुक्र, गुरु और बुध से देखा जाता हो तो गजकेसरी योग होता है।।१।। गजकेसरिसञ्जातस्तेजस्वी धनवान् भवेत्। मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरों भवेत् ।।२।। इस योग में उत्पन्न पुरुष धनी, मेधावी, गुणी एवं राजा का प्रिय करने वाला होता है।।२।। अथामलायोगस्तत्फलं चाह- लग्नाद्वा चन्द्रलग्नाद्वा दशमे शुभसंयुते । योगोऽयममला नाम कीर्त्तिराचन्द्रतारकी ।।३।। राजपूज्यो महाभोगी दाता बन्धुजनप्रियः। परोपकारी गुणवानमलायोगसम्भवः ।।४।। जन्मलग्न से वा चन्द्रमा से दशम स्थान में केवल शुभग्रह हों तो अमला योग होता हैं। अमला योग में उत्पन्न पुरुष की कीर्त्ति जब तक चन्द्रमा आकाश में रहेगा तब तक रहती है और वह राजा से पूज्य, महाभोगी, दाता और बंधुओं का प्रिय होता है ।।३-४।। अथ शुभाशुभयोगस्तत्फलं चाह- शुभाशुभाढ्ये यदि जन्मलग्ने शुभाशुभाख्यौ भवतस्तदानीम्। व्ययस्वगैः पापशुभैर्विलग्नात्पापाख्यसौम्यग्रहकर्त्तरी च ।।५।। शुभयोगभवो वाग्मी रूपशीलगुणान्वितः। पापयोगोद्भवः कामी पापकर्मपरार्थयुक् ।।६।। यदि लग्न में शुभग्रह युत हों तो शुभयोग और पापग्रह युत हों तो अशुभ योग होता है। १२।२ भाव में पापग्रह हों तो पापकर्त्तरी और शुभग्रह हों