बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ राजयोगादिफलाध्यायः २२१ ऐरावतांश में हो तो स्वयं धर्माचार्य होता है, चाहे श्रीराम हों वा युधिष्ठिर होता है।।२२।। अथ विशेषयोगफलम्— अथ योगफलं ब्रूमो ज्ञातव्यं च विशेषतः। पारिजातादिकानां च फलमेवैकसंस्थितम् ।।२३।। अब विशेषकर योगफल को कह रहा हूँ, पारिजातादि योगों से भिन्न इनका फल होता है।।२३।। लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं च विष्णुस्थानं च केन्द्रकम्। तयोः सम्बन्धमात्रेण राजयोगादिकं भवेत् ।।२४।। त्रिकोण (९।५) लक्ष्मी का स्थान और केन्द्र (१।४।७।१०) विष्णु का स्थान है। इन दोनों के संबंध मात्र से राजयोग होता है।।२४।। केन्द्रपुत्रेशयोर्योगे योगोऽमात्याभिधो भवेत्। पारिजातादिके तौ च तदा स प्रबलो भवेत् ।।२५।। केन्द्रेश और पंचमेश के योग से 'अमात्य' नाम का योग होता है। यदि योगकारक पारिजातादि वर्ग में हो तो प्रबल राजयोग होता है।।२५।। लग्नेशेन धनेशाद्यात्रैव योगः प्रकीर्त्तितः। मन्त्रेशोऽमात्यतां याति सप्तमाधीशयोगतः ।।२६।। लग्नेश के साथ धनेश आदि के संबंध से योग नहीं होता है। पंचमेश सप्तमेश से योग होता हो तो अमात्य योग होता है।।२६।। कर्मेशस्य तु योगेन राजा साचिव्यतामियात्। केन्द्रधर्मेशयोर्योगे राजा वै राजवन्दितः।।२७।। इसी में कर्मेश योग करता हो तो राजा या मंत्री होता है। केन्द्रेश और नवमेश का योग हो तो राजा से वंदित राजा होता है।।२७।। धर्मकर्माधिपौ चैव व्यत्यये तावुभौ स्थितौ। युक्तश्चेद्द्वौ तदा वाच्यः सर्वसौख्यसमन्वितः ।।२८।। धर्मेश, कर्मेश व्यत्यय से अर्थात् धर्मेश कर्म में और कर्मेश धर्म भाव में अथवा एकत्र युक्त हों तो सभी सुखों से युक्त होता है।।२८।। पारिजाते स्थितौ तौ तु दण्डे लोकानुशिक्षकः। उत्तमे चोत्तमो भूयो गजवाजिरथादिमान् ।।२९।।