बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि धर्मेश कर्मेश पारिजात में हों तो राजा दंड का शिक्षक होता है। उत्तमांश में हो तो हाथी-घोड़े से युक्त उत्तम राजा होता है।।२९।। गोपुरे नृपशार्दूलो पूजितांघ्रिर्नृपैर्भवेत्। सिंहासने चक्रवर्त्ती सर्वक्षोणीशपालकः।।३०।। गोपुरांश में हों तो राजाओं में सिंह, राजाओं से पूज्यचरण वाला राजा होता है। सिंहासनांश में हों तो सभी राजाओं का पालन करने वाला चक्रवर्ती राजा होता है।।३०।। इति राजयोगादिविचारकथनम्। अथ राजयोगाध्यायः पराशर उवाच- अथातः संप्रवक्ष्यामि राजयोगां द्विजोत्तम। येषां विज्ञानमात्रेण नृपपूज्यो जनो भवेत्।।१।। पराशर ने कहा-हे विप्र ! अब मैं राजयोगों को कहता हूँ, जिनके जानने से मनुष्य राजा से पूज्य होता है।।१।। ये ये योगाः पुरा शम्भुभाषिताः शैलजाग्रतः। तेषां सारमहं वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।।२।। पहले शंकरजी ने पार्वतीजी से जिन-जिन योगों को कहा था मैं उनके सार को तुमसे कह रहा हूँ।।२।। चिन्तयेत्कारके लग्ने जनुर्लग्नेऽथवा द्विज। राजयोगप्रदातारौ लग्नौ द्वौ प्रथमोदितौ।।३।। आत्मकारकांश लग्न और जन्मलग्न यही दो लग्न मुख्यतः राजयोग- कारक होते हैं।।३।। आत्मकारकपुत्राभ्यां राजयोगं प्रकल्पयेत्। तनुपञ्चमनाथाभ्यां तथैव द्विजसत्तम।।४।। आत्मकारक और पंचमेश से राजयोग को देखना चाहिए। इसी प्रकार जन्मलग्न और उससे पंचमाधिपति द्वारा राजयोग देखना चाहिए।।४।। विलग्नात्पञ्चमाधीशः पुत्रात्माकारको द्वयः। विप्रसम्बन्धयोगेन ज्ञेयाः वीर्यबलान्विताः।।५।।