बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्न वा कारक से १२वें भाव पर लग्नेश वा कारक की दृष्टि हो तो जातक अधिक व्यय करने वाला होता है।।१३।। ये ये ग्रहा धर्मपबुद्धिपाभ्यां युक्ता न दृष्टा बहुदुःखदास्ते। रन्ध्रादिषष्ठव्ययपैर्युतांस्ते व्ययप्रदा मारकनाथकेन ।।१४।। जो-जो ग्रह त्रिकोणेश से युत-दृष्ट न होकर त्रिकेश (६-८-१२) से युत हों और मारकेश से दृष्ट हों, वे अपने दशा में दुःखदायी होते हैं।।१४।। अथ दरिद्रभङ्गयोगाः- धनसंस्थौ च भौमेन्दू कथितौ धननाशकौ। बुधेक्षितौ महावित्तं कुरुतस्तत्रगः शनिः ।।१५।। धन भाव में भौम-चंद्रमा धननाशक होते हैं, किंतु बुध से देखे जाते हों तो महाधनी होता है एवं शनि हों तो भी महाधनी होता है।।१५।। निःस्वतां कुरुते तत्र रविनित्यं यमेक्षितः। महाधनयुतं ख्यातं शन्यदृष्टः करोत्यसौ ।।१६।। दूसरे भाव में रवि हो और शनि से देखा जाता हो तो दरिद्र होता है, किंतु शनि न देखता हो तो महाधनी होता है।।१६।। धनभावगताः सौम्याः कुर्वन्त्येव धनं बहु। बुधदृष्टो गुरुस्तत्र निर्धनं कुरुते नरम् ।।१७।। धनभाव में शुभग्रह हों तो बहुत धन होता है, किंतु उसी भाव में गुरु हो और बुध देखता हो तो निर्धन होता है।।१७।। बुधश्चन्द्रेक्षितस्तत्र सर्वस्वं हन्ति निश्चितम्। क्रूरखेटादियोगैश्च दारिद्र्यं सम्भवेन्नृणाम् ।।१८।। यदि बुध हो और चंद्रमा देखता हो तो सर्वस्व का नाश होता है। क्रूरग्रह आदि के योग से जातक को दरिद्रयोग होता है।।१८।। इति दारिद्र्योगाध्यायः। ग्रहाणामवस्थाध्यायः मैत्रेय उवाच- आदित्यादिग्रहाणां च ह्यवस्था च पृथक् पृथक्। भेदाः कतिविधाः सन्ति कथय त्वं कृपानिधे ! ।।१।।