बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहाणामवस्थाध्यायः २३३ मैत्रेय ने कहा-हे कृपानिधि ! सूर्य आदि ग्रहों की अवस्थाओं के भेद और उनकी संख्या पृथक्-पृथक् मुझसे कहें ।।१।। पराशर उवाच- भास्करादिग्रहाणां च ह्यवस्था विविधानि च। षण्णवत्याश्रितावस्था सारभूतं वदाम्यहम् ।।२।। पराशरजी ने कहा- सूर्य आदि ग्रहों की अनेक अवस्थायें हैं, जिनकी संख्या ९६ हैं। उनमें सारभूत प्रधान अवस्थाओं को कह रहा हूँ।।२।। अथ जाग्रदाद्यवस्था तत्फलं चाह- त्रिंशदंशं त्रिभागं च कल्पयित्वा पृथक् पृथक् । विषमादिक्रमेणैव समे वै विपरीतकम् ।।३।। विज्ञानं प्रथमं पुंसां जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिकाः। विशेषतः परीक्ष स्याज्जागरः कार्यसाधकः ।।४।। तीस अंशात्मक राशि के तीन भाग करके दश-दश अंश के एक-एक भाग का विषम राशि में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त अवस्था होती है और समराशि में विलोम(सुषुप्त, स्वप्न, जाग्रत्) अवस्था होती है। परीक्षण से यह निश्चित है कि जाग्रत् अवस्था में कार्य सिद्ध होता है।।३-४।। स्वप्नावस्था मध्यफला उपदेष्टा गुरुर्यदि। निष्फला चरमावस्था ज्ञातव्या मुनिसत्तम ।।५।। स्वप्नावस्था मध्यम फलदायक और सुषुप्त अवस्था निष्फल होती है।।५।। अथ दीप्ताद्यवस्था तत्फलं चाह- दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽतिदुःखितः। विकलश्च खलः क्रोधी नवधा खेचरो भवेत् ।।६।। दीप्त, स्वस्थ, मुदित, शांत, दीन, अतिदुःखी, विकल, खल और कोपी- ये नव अवस्थायें होती हैं।।६।। उच्चस्थः खेचरो दीप्तः स्वस्थः स्यादधिमित्रके। मुदितो मित्रभे शान्तः समभे दीन उच्यते ।।७।।