भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् , असंस्कृतपिण्डायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
१२२०१३१०१२१७१८वर्ष
२११८१११७१६मास
१९२२२११०१०दिन
३५१०५८३५१६५५४२घटी
२४२५४८३०१५४०पल
असंस्कृतनिसर्गायुचक्रम्—
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
:---:---:---:---:---:---:---:---
१३१५१५४६वर्ष
१८१०१०१३१४१०मास
१११०१०१११८दिन
२६२९५५२०४२५८१६घटी
१३५४५१४८२०४०पल
विशेष— सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्य का पिण्डायुवर्षादि
२१।२१।१९।३५।२४ ÷ ६ = २।३।१८।१५।५४ लब्धि वर्षादि हुई। इस
लब्धि को सूर्यायु—
१२।२१।१९।३५।२४ में
लब्धि २।३।१८।१५।५४ को घटाया तो
शेष स्पष्टसूर्यायुवर्षादि १०।१८।१।१९।३० हुए।
चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई लक्षण न होने से स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि
२०।१८।२२।१०।२५ हुए।
भौम अपने नवांश में हैं, अतः भौमायु १३।११।२१।५८।० × २ =
२७।११।१३।५६।० भौमायु हुआ।
बुध में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने से बुधायुवर्षादि
१०।९।१०।३५।४८ हुआ।
गुरु आठवें भाव में है, गुरु से आयु का आधा भाग घटाकर शेष को
दूना करने से गुरु के आयु में से घटाकर शेष को दूना करने से गुरु की
स्पष्टायु वर्षादि ६।८।१८।१५ हुई।
शुक्र में कोई हानि-वृद्धि का योग न होने से शुक्रायुवर्षादि
१७।०।१०।५५।१५ हुई।