बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहस्वरूपाध्यायः २९ बृहद्गात्रो गुरुश्चैव पिङ्गलो मूर्धजेक्षणः। कफप्रकृतिको धीमान् सर्वशास्त्रविशारदः।।१६।। गुरु-लम्बी शरीर, पीले शिर के केश और दृष्टि वाला, कफ प्रकृति, बुद्धिमान्, सभी शास्त्रों का जाननेवाला है।।१६।। सुखी कान्तवपुः श्रेष्ठ सुलोचनो भृगोः सुतः। काव्यकर्त्ता कफाधिक्यानिलात्मा वक्रमूर्धजः।।१६।। शुक्र-सुन्दर शरीर, सुखी, अच्छे सुन्दर नेत्रोंवाला, काव्य (कविता) करनेवाला, कफ-वायुमिश्रित प्रकृति, टेढ़े शिर के बालों वाला है।।१७।। कृशदीर्घतनुः सौरिः पिङ्गदृष्ट्यनिलात्मकः। स्थूलदन्तोऽलसो पङ्गु खररोमकचो द्विज ! ।।१८।। शनि-दुर्बल लम्बी शरीर, पीले नेत्र, वायु प्रकृति, मोटे दाँत, आलसी, पंगु, रूखे रोम और बालों वोला है।।१८।। धूम्राकारो नीलतनुर्वनस्थोऽपि भयङ्करः। वातप्रकृतिको धीमान् स्वर्भानुः प्रतिमः शिखी।।१९।। राहु-धुएँ के सदृश वर्ण, नीले रंग की शरीर, जंगल में रहनेवाला, भयंकर, वायु प्रकृति और बुद्धिमान् है। केतु का भी स्वरूप राहु के समान ही है।।१९।। अस्थिरक्तस्तथा मज्जा त्वक्वसावीर्यस्नायवः। तासामीशा क्रमेणोक्ता ज्ञेयाः सूर्यादयो द्विजाः।।२०।। सूर्य आदि क्रम से अस्थि (हड्डी), रक्त, मज्जा, त्वक् (चर्म), वसा, वीर्य, स्नायु (नस) इनके स्वामी हैं।।२०।। देवालयं जलं वह्नी क्रीडादीनां तथैव च। कोशशय्या ह्युत्कराणामीशाः सूर्यादयः क्रमात्।।२१।। एवं सूर्य आदि ग्रहों के क्रम से देवालय, जलाशय, अग्निस्थान, क्रीडास्थान, कोश (खजाना), शय्यास्थान, ऊसरभूमि ये स्थान हैं।।२१।। अयनक्षणवासर्तुमासपक्षसमा - द्विज ! । सूर्यादीनां क्रमाज्ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम । २२ ।। सूर्य आदि ग्रह क्रम से अयन, क्षण (मुहूर्त), वासर (दिन), ऋतु, मास, पक्ष, वर्ष के स्वामी हैं।।२२।।