बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् . केन्द्रादित्रिकयोगेन दीर्घमध्याल्पतायुषि । स विज्ञेया महाप्राज्ञ तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥३॥ वह यदि केंद्र में हो तो दीर्घायु, पणफर में हो तो मध्यायु और आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होती है।।३।। केन्द्रे स्थितेऽपि दीर्घायुर्मध्यायुः पणफरे स्थिते । आपोक्लिमे स्थिते त्वल्पमायुर्भवति निश्चितम् ।।४।। इसी प्रकार लग्न और उससे सप्तम भाव, दोनों से अष्टमेश, इन दोनों अष्टमेशों में जो बली हो वह यदि केंद्र में हो तो दीर्घायु, पणफर में हो तो मध्यायु और आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होती है।।४।। लग्नात्तत्सप्तमाद्विप्र अष्टमेशो तयोर्द्वयोः। ताभ्यां मध्ये बली चैकः स्थितः केन्द्रादि पूर्ववत् । दीर्घमध्याल्पभेदेन आयुर्निश्चित्य पूर्ववत् ।।५।। हे विप्र ! लग्न और सप्तम से जो अष्टमेश, दोनों में जो एक बली, उसके केन्द्रादि में रहने से पूर्ववत् दीर्घ, मध्य, अल्पायु का निर्णय करना चाहिए।।५।। पूर्ववद्दृन्दखण्डस्य त्रैराशिकक्रमेण च। आयुर्दायकृते स्पष्टं प्रवक्ष्यामि इदं वचः ।।६।। इस प्रकार दीर्घ आदि में आयु का निर्णय करके पूर्व कहे हुए आयु को स्पष्ट करके निर्णय इस प्रकार करना चाहिए।।६।। स्वस्मिन्समबले खेटेऽनधिके च बले द्विज। न वीर्यतायां दीर्घादि विपरीतायुषि भवेत् ।।७।। यदि आयुर्कर्ता ग्रह समान बल के अथवा अल्प बल के हों तो दीर्घादि विपरीत आयु होती है।।७।। दीर्घमध्ये च वाल्पं च स्वल्पं वा किञ्चिदेव च । विपरीतं योगभङ्गे सत्यमेव न संशयः ।।८।। दीर्घ, मध्य, अल्प वा उससे कुछ कम आयु होती है। इस प्रकार योग भंग होने से विपरीत आयु होती है।।८।। अथाग्रेऽनेकभेदानामायुषो निर्णयः कृतः। दीर्घादित्रयरूपेण इत्युक्तं ब्रह्मणोदितम् ।।९।।