बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः २७९ दोनों दशाओं में (दशा-अंतर्दशा) में अर्थात् द्वारेश स्वयं पापी हो अथवा पापग्रह से देखा जाता हो वा पापयुक्त हो तो उसकी दशा या अंतरदशा में मृत्यु होती है।॥७०॥ अथवा योगायुर्दायसमाप्तिसमयेष्वपि। प्रोक्ते मूलाश्रयीभूते चिन्तनीयं द्विजोत्तम ॥७१॥ अथवा योगज आयु की समाप्ति समय में मृत्यु काल के समीप की दशा में मृत्यु का विचार करना चाहिए।।७१।। खण्डे वा यदि पाकस्य बाह्यस्य मलिने यदि। दशा न हि समाप्येत तत्रिकोणान्दके मृतिः ।।७२।। अथवा बाह्य राशि के मलिन होने के समय उसके खंड में यदि दशा न समाप्त हो तो उसकी त्रिकोण राशि के वर्ष में मृत्यु होती है।।७२।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि मृत्युयोगापवादकम्। शुभदृष्ट्या शुभयोगे शुभखेचरसंयुते ।।७३।। यदि द्वारबाह्य राशि वा उनके स्वामी शुभ ग्रह से युक्त वा शुभ दृष्टि से युक्त हों तो।।७३।। न च द्वारे न बाह्ये च द्वारेशे चोपलक्षिते। द्वारेशांश्चयनवांशभुक्तौ च निधनं भवेत् ।।७४।। उक्त द्वार बाह्य राशि वा इनके स्वामियों की दशा अंतर में मृत्यु नहीं होती है, किन्तु द्वारेश के आश्रयीभूत नवांश की दशा में मृत्यु होती है।।७४।। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रकारं वै द्वितीयकम्। यस्य विज्ञानमात्रेण आयुर्दासूचको भवेत् ।।१।। अब मैं आयु के निर्णय का दूसरा प्रकार कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से आयु को जाननेवाला मनुष्य होता है।।१।। कारकान्तत्सप्तमाद्विप्र अष्टमेशो तयोर्द्वयोः। मध्ये चैको बली चिन्त्यः सोऽपि ह्यायुःप्रदो ग्रहः ।।२।। आत्मकारक और उससे सातवाँ भाव दोनों से जो अष्टमेश, दोनों अष्टमेशों में जो बली हो ।।२।।