बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् त्रिषडायगताः पापाः शुभाः केन्द्रत्रिकोणगाः। लग्नेशो बलसंयुक्तः पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत् ॥६३॥ ३।६।११ भाव में पापग्रह हों और शुभग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों तथा लग्नेश बली हो तो पूर्ण आयु होती है॥६३॥ षट्सप्तरन्ध्रभावेषु संयुक्तेषु शुभेषु च। त्रिषडायेषु पापेषु पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत् ॥६४॥ ६।७।८ भाव में शुभ ग्रह हों और ३।६।११ भाव में पापग्रह हों तो पूर्ण आयु होती है॥६४॥ अथायुर्बाधकं विप्र कथयामि तवाग्रतः। दीर्घायुर्योगं सम्प्राप्य प्रकारशकलेष्वपि॥६५॥ आयु के बाधक योगों को कह रहा हूँ॥६५॥ अथ निधनसमयज्ञानम्- किं दशायां च निधनमिति ज्ञातुमपेक्षया। निर्णयं तस्य कुर्वीत तवाग्रे कथयाम्यहम्॥६६॥ तीनों प्रकार से दीर्घायु योग के प्राप्त होने पर किस दशा में मृत्यु होती है, इसके ज्ञान के लिए मै निर्णय कह रहा हूँ॥६६॥ दीर्धे द्विसप्ततिवर्षे तदूर्ध्वं तु चिन्तयेन्मृतिम्। षट्त्रिंशदकादूर्ध्वं च चिन्तयेन्मध्यमायुषि॥६७॥ दीर्घायु योग में ७२ वर्ष के बाद और मध्यायु योग में ३६ वर्ष के बाद मृत्यु का विचार करना चाहिए॥६७॥ अथ स्पष्टं प्रवक्ष्यामि मलिने द्वारबाह्ययोः। नवांशे निधनं तस्य त्रिशूलिभाषितं पुरा॥६८॥ द्वार राशि और बाह्य राशि के पापाक्रांत होने से उसकी दशा में मृत्यु होती है॥६८॥ द्वारद्वारेशयोर्विप्र मालिन्ये तन्नवांशके। जातस्य हि भवेन्मृत्युः सत्यमेव न संशयः॥६९॥ अथवा द्वार राशि वा द्वारेश के पापाक्रांत होने से उसकी दशा में मृत्यु होती है॥६९॥ पाकभोगद्वये विप्र चिन्तनीयं प्रयत्नतः। स्वयं पापः पापदृष्टे पापखेटसमन्विते। तन्नवांशदशाकाले निधनं च भवेद्ध्रुवम् ॥७०॥