बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः २८३ रविः कुजः शनी राहुर्मरणे बलिनः क्रमात्। विशेषं दुर्बलं हित्वा गृह्णीयाद्बलिनः सुधीः।।२४।। सूर्य, भौम, शनि और राहु ये प्रबल मारक होते हैं। इनमें जो विशेष दुर्बल हो उसे छोड़कर प्रबल को ही लेना चाहिए।।२४।। केतुश्च शनिवन्मृत्युनाथसम्बद्धमादिशेत्। शनिना राहुणा वापि युक्ते सौम्ये रवीक्षिते।।२५।। केतु भी शनि के समान ही मारक होता है। शनि वा राहु के साथ शुभ ग्रह युत हो तथा सूर्य से देखा जाता हो तो।।२५।। पर्यायमेकं तन्मध्ये एकराशौ मृतिं वदेत्। तयोस्तु शुभयोगेन तद्दशामृतिमादिशेत् ।।२६।। एक पर्याय के मध्य में ही मृत्यु करता है। दोनों यदि शुभयुक्त हों तो उनकी दशा में मृत्यु होती है।।२६।। भोगराशौ दुर्बले वा प्रबले ग्रहसंस्थिते। तथापि निर्दिशेत्काले मरणं नात्र संशयः।।२७।। अन्तर दशा की राशि दुर्बल हो वा प्रबल ग्रह से युक्त हो तो उसके समय में मृत्यु कहना चाहिए।।२७।। केतौ चैवासनस्थे वा नाथे वाऽशुभवीक्षिते। केतोर्दशान्ते मृत्युः स्याच्छुभदृष्टेन किञ्चन।।२८।। यदि केतु अंत्य में हो अथवा उस राशि के स्वामी पापग्रह से देखा जाता हो तो केतु की दशा में मृत्यु होती है। शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो कुछ भी नहीं होता है।।२८।। तन्वधीशाष्टमेशाभ्यां योगेनायुः कृते द्विज। अष्टमेशस्य स्वोच्चस्थे चरपर्याब्दप्रमाणके।।२९।। लग्नेश, अष्टमेश से आयु योग होता हो और अष्टमेश अपनी उच्च राशि में हो तो चर पर्याय के वर्ष में।।२९।। अर्धाधिकाब्दं दत्वैव योजयेत्पूर्वमायुषि। एवं नाथान्तरीत्या च चरपर्यातिरिक्तकः।।३०।। आधे से अधिक वर्ष पूर्व आयु में जोड़कर विचार करना चाहिए। इस प्रकार राशिस्वामी तक चर पर्याय में विचार करना चाहिए।।३०।।