बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मर्यादायापि यदायुरष्टमेशेन दीयते। तत्सर्वमर्धाधिक्ये च विधेयं द्विजसत्तम।।३१।। मर्यादा के अनुसार अष्टमेश जिस आयु को देता हो उसमें अर्धाधिक्य कर देना चाहिए।।३१।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र नीचराशिगतोऽपि च। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं च नाशयेत्।।३२।। इसी प्रकार अष्टमेश नीच राशि में हो तो उससे प्राप्त आयु का आधा ह्रास हो जाता है।।३२।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र नीचखेटेन संयुतः। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं विनश्यति।।३३।। अथवा अष्टमेश किसी नीच राशि में स्थित ग्रह से युक्त हो तो भी प्राप्त आयु का आधा ह्रास होता है।।३३।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र तुङ्गखेटेन संयुतः। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं च वर्धति।।३४।। इसी प्रकार अष्टमेश उच्च स्थित ग्रह से युक्त हो तो उससे प्राप्त आयु का आधा बढ़ता है।।३४।। एवमुक्तं च विप्रेन्द्र परमायुर्विनिश्चितम्। लग्नेशाष्टमेशाभ्यां योगायुर्दायमागते।।३५।। इस प्रकार मैंने आयु का निर्णय तुमसे कहा। लग्नेश, अष्टमेश के योग से आये हुए आयुर्दाय का।।३५।। तेषु संस्कारमाज्ञेयमिदं पूर्वोक्तसंकथाम्। लग्नेशाद्र्दायुरित्येवं तत्तद्योगकलात्मकम्।।३६।। यथोचित संस्कार करके जो फल उच्च-नीचादि के अनुसार का आवे।।३६।। संभुक्ताश्च ग्रहा उच्चनीचादिगुणदोषतः। वृद्धिह्रासावुक्तरीत्या कार्या वै सम्प्रदायतः।।३७।। उसे आयु में जोड़ देना चाहिए और संप्रदाय के अनुसार ह्रास-वृद्धि भी कर देना चाहिए।।३७।।