बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः २८५ द्वित्र्यादिमृत्युयोगश्च प्रबलः पूर्वभाषितः। नैसर्गिकोऽपि वीर्याय तस्य पाके मृतिर्भवेत् ।।३८।। यदि पूर्व में कहे हुए दो या तीन प्रबल मृत्यु योग हों तो नैसर्गिक योग- कारक भी बलवान् होते हैं। उसी की दशा में मृत्यु कहना चाहिए ।।३८।। रव्यारराहुपंगूनां चतुःखेटान्तरे बली। तस्य योगानुसारेण जातकस्य मृतिं वदेत् ।।३९।। रवि, भौम, राहु और शनि इन चारों में जो बलवान् हो उसी की दशा में मृत्यु होती है।।३९।। अष्टमेशेन संयुक्तः शनिराहुः कुजो रविः। न वीक्ष्यन्ते ग्रहैर्वापि तस्य मृत्युं विनिर्दिशेत् ।।४०।। यदि शनि, राहु, भौम और रवि में से कोई अष्टमेश से युत हो, अन्य ग्रहों से न देखे जाते हों तो उसकी दशा में मृत्यु होती है।।४०।। एषां मध्येषु प्रबला सा तत्स्वामिकराशिगे। पाके मृत्युं विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।४१।। इनमें जो प्रबल हों तो उसके स्वामी की राशि की दशा में निःसंशय मृत्यु होती है।।४१।। एषां चतुर्ग्रहाणां च मध्ये चैको बली क्वचित्। तस्य राशिदशाकाले मृतिस्थानं विनिर्दिशेत् ।।४२।। इन चारों ग्रहों में कोई एक बली ग्रह हो उस ग्रह की राशि दशा में मृत्यु होती है।।४२।। मृत्युस्थानाभिभूतायां सिद्धायां च महादशा। तत्तस्यापि क्रमेणैव तदनन्तरमृतिप्रदा ।।४३।। मृत्युकारक ग्रह के निर्णयानुसार उसकी अंतर्दशा में भी मृत्यु होती है।।४३।। शुभग्रहेण सम्बन्धे शनिराहु कुंजो रविः। तत्तस्वामिदशाकाले मरणं च विनिर्दिशेत् ।।४४।। यदि शनि, राहु, भौम, रवि शुभग्रह से सम्बन्ध करते हों तो भी उनकी दशा में मृत्यु होती है।।४४।।