भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

२८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तदाश्रयरोशिपाके मृत्युर्भवति निश्चितम्। निर्विशङ्कं महाप्राज्ञ पुरा शम्भुप्रणोदितम् ।।४५।। एवं उनके आश्रयभूत राशि की दशा में भी मृत्यु होती है ।।४५।। सुखदुःखादि सन्ब्रूयात्पाकराशौ विचिन्तयेत्। योगान्तर्गता त्तत्तु तत्तद्वीर्यानुसारतः ।।४६।। पाकेश्वर के अनुसार सुख-दुःखादि उस ग्रह के योग और बल के अनुसार कहना चाहिए ।।४६।। सबलायां सुखं ब्रूयाद्दुर्बला दुःखदायिका। वैषम्येन फलं वाच्यं तथा मरणमेव च ।।४७।। यदि बलवान् हो तो मृत्यु और निर्बल हो तो दुःख देने वाला होता है, वैषम्य हो तो मृत्यु होती है ।।४७।। द्वादशे दशमे वापि संस्थिते पुच्छनायके। पापदृष्टे दशाप्राप्ते तदन्तरगते मृतिः ।।४८।। यदि केतु १२ या १० भाव में हो और पापग्रह से दृष्ट हो तो उसके दशा और अन्तर से मृत्यु होती है ।।४८।। द्वादशे दशमे केतुः शुभग्रहनिरीक्षितः। नायं योगो महाप्राज्ञ न कष्टं न च मृत्युकृत् ।।४९।। यदि १२ या १० भाव में केंतु हो और शुभग्रह से देखा जाता हो तो यह योग न तो कष्टकारक होता है और न मृत्युकारक होता है ।।४९।। प्राणिनीत्युक्तं विप्रेन्द्र प्राणानयनमुच्यते। राश्यधीनं बलं ज्ञेयं तदुक्तं कथ्यतेऽधुना ।।५०।। पहले बल की चर्चा कर आये हैं अतः उसका विचार कह रहे हैं। राशि के अधीन ही बल का विचार होता है ।।५०।। अग्रहात्सग्रहो ज्यायान्सग्रहे त्वधिकग्रहः। साम्ये चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमात्स्युर्बलशालिनः ।।५१।। जो ग्रह अकेला है उसकी अपेक्षा ग्रहयुक्त ग्रह बली होता है। ग्रहयुक्त ग्रह यदि समान ग्रहों से युक्त हो तो जो संख्या में अधिक ग्रहों से युक्त हो वह उसकी अपेक्षा बली होता है। इसमे भी समानता हो तो चर राशि में बैठे हुए की अपेक्षा स्थिर राशिवाला और इसकी अपेक्षा द्विस्वभावस्थ बली होता है ।।५१।।