भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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आयुर्दायाध्यायः २८७ अथ दीर्घादियोगेषु त्रिषु च द्विजसत्तम। कक्षाह्रासकृते योगान्दर्शयामि तवाग्रतः॥५२॥ दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु योगों में कक्षा के ह्रास की स्थिति को कह रहा हूँ॥५२॥ लग्नसप्तमयोर्विप्र द्विद्वादशकयोरपि। षष्ठरन्ध्राधिपस्यापि जनुल्लग्ने विचिन्तयेत् ॥५३॥ लग्न सप्तम, द्वितीय-द्वादश, षष्ठ-अष्टम इनके अधिपति॥५३॥ पापाक्रान्ते पापयोगे पापमध्यत्वमागते। कक्षाह्रासो विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥५४॥ पापाक्रांत पापग्रह पापग्रह से युक्त और और पापग्रह के मध्यम में हो तो कक्षा का ह्रास होता है॥५४॥ दीर्घस्य मध्यमा याता भवेदायूषि मध्यमे। अल्पादल्पं च विज्ञेयं कक्षाह्रासस्य लक्षणम्॥५५॥ अर्थात् दीर्घायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो अल्पायु और अल्पायु हो तो उससे भी अल्प आयु होती है। यही कक्षाह्रास का लक्षण है॥५५॥ कक्षाह्रासो यदार्थोऽपि पूर्ववज्जायते ध्रुवम्। अथैवं लग्नकुण्डल्यां पापयोगत्रिकोणके॥५६॥ कक्षाह्रास होने से आर्थिक स्थिति में न्यूनता आ जाती है। इसी प्रकार लग्न कुंडली में भी त्रिकोण में पाप योग से कक्षाह्रास होता है॥५६॥ लग्नपञ्चमभाग्येषु पापयोगकृते द्विज। कक्षाह्रासो भवेद्विप्र निर्विशङ्कं विधेः सुत ॥५७॥ लग्न, पंचम और नवम भाव में पाप ग्रह का योग होने पर कक्षा का ह्रास होता है॥५७॥ अत्रास्मिन्कारके लग्ने चिन्तयेज्जनिलग्नवत्। कारकांशे द्यूनराशेः पापमध्यत्वमेव हि॥५८॥ कारक लग्न में भी जन्मलग्न के समान ही विचार करना चाहिए। कारकांश से सप्तम भी पापमध्य में हो तो भी कक्षाह्रास होता है॥५८॥