बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् एको योगः स विज्ञेयः कक्षाह्रासं च पूर्ववत्। अथैककक्षाह्रासस्य चापवादं वदाम्यहम्।।५९।। अब इसका अपवाद कह रहा हूँ।।५९।। एकस्थकक्षाह्रासं च वित्तपे चान्यथा भवेत्। पूर्ववच्छुभयोगेन कक्षावृद्धिर्भविष्यति।।६०।। जिसमें शुभ योग होने से कक्षावृद्धि होती है।।६०।। जनुर्लग्ने कारके च चिन्तयेत्पूर्ववद्विज। लग्ने द्यूने धने रिष्फे षष्ठे रंध्रे स्थलत्रये।।६१।। लग्न, सप्तम, द्वितीय, द्वादश, षष्ठ और अष्टम इनमें किन्हीं तीन स्थान में।।६१।। शुभखेटकृते योगे कक्षावृद्धिर्भवत्यपि। चिन्तयेत्पूर्ववद्विप्र त्रिकोणेषु स्थलद्वये।।६२।। शुभ ग्रह का योग हो तो कक्षा की वृद्धि होती है। इसी प्रकार दोनों त्रिकोणों में भी विचार करना चाहिए।।६२।। जनुर्लग्नं कारकं च शुभयोगं करोति चेत्। कक्षावृद्धिर्न सन्देहो भविष्यति द्विजोत्तम।।६३।। तथा जन्मलग्न और कारक शुभग्रह से योग करता हो तो कक्षा की वृद्धि होती है इसमें संदेह नहीं है।।६३।। कारके च त्रिकोणस्थ नीचस्थाः पापखेचराः। कक्षाह्रासो महाप्राज्ञ द्वितयेन भविष्यति।।६४।। यदि कारक त्रिकोण में हो और पापग्रह अपनी नीचराशि में हो तो दोनों से कक्षा का ह्रास होता है।।६४।। कारकांशात त्रिकोणेषु शुभखेटे शुभस्थले। कक्षावृद्धिर्भवेत्तत्र न सन्देहो द्विजोत्तम।।६५।। कारकांश में त्रिकोण में शुभराशि में शुभग्रह हो तो कक्षा में वृद्धि होती है।।६५।। कारके पापखेटाच्च अन्त्यगें पापसंयुते। कक्षाह्रासो भवेत्तत्र प्रणीते द्विजसत्तम।।६६।। पापग्रह १२वें भाव में कारक हो और पापग्रह से युक्त हो तो कक्षा का ह्रास होता है।।६६।।