बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पूर्वोक्त पापग्रह योग में शनि योग करता हो तो वहाँ पर कक्षा ह्रास में एक राशि का ह्रास होता है।।७४।। अथ स्थिरदशायां मृत्युसमयज्ञानम्- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषेण द्विजोत्तम। आलम्ब्य स्थिरदंशायां योगात्रिधनमेव च।।७५।। अब मैं स्थिर के अनुसार चार खंड के अनुसार मृत्युसमय को कह रहा हूँ।।७५।। त्रित्रिभिराशिभिरेकं खण्डाश्चत्वार एव च। कस्मिन्खण्डे च निधनं तस्य योगं विचिन्तयेत् ।।७६।। तीन-तीन राशियों के चार खंड होते हैं। किस खंड में मृत्यु होगी इसको कहता हूँ।।७६।। योगत्रयमहं वक्ष्ये दीर्घमध्याल्पभेदतः। चतुःखण्डेषु यत्रायुरागतां तत्र चिन्तयेत् ।।७७।। दीर्घायुर्योगवत्तत्तु यस्मिन्खण्डे समागते। तस्मिन्खण्डे च निधनं भवत्यपि न सन्देहः ।।७८।। दीर्घायु, मध्यायु, अल्पायु के भेद चारों खंडों में जहाँ समाप्त हो उसी समय मृत्यु को कहना चाहिए।।७७-७८।। वक्ष्यमाणप्रकारेण मध्यमाल्पायुषि द्विज। निधनाश्रयखण्डेषु लक्षणाक्रान्तया दशा ।।७९।। इसी प्रकार मध्यायु और अल्पायु के खंडों में जिस खंड के जिस दशा में मृत्यु का संदेह हो उसी खंड में उसे कहना चाहिए।।७९।। तद्दशायां च निधनं भवत्येव द्विजोत्तम। कदाचित्र मृतिस्तत्र क्लेशदुःखभयानि च।।८०।। यदि कदाचित् मृत्यु न हो तो उस समय क्लेश, दुःख और भय होता है।।८०।। भवन्ति तत्र संस्कारं पुनरित्थं वदाम्यहम्। पापद्वयमध्यगते राशिपाके मृतिर्भवेत् ।।८१।। पापग्रहों के मध्य में स्थित राशि की दशा में मृत्यु होती है।।८१।।