बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः २९१ लग्नाद्वा कारकाद्विप्र पापाक्रांते त्रिकोणके। द्वादशाष्टमराश्येवं पापाक्रांतं भवेदपि॥८२॥ लग्न से आत्मकारक से त्रिकोण में पापग्रह हों अथवा १२वीं राशि में पापग्रह हों॥८२॥ तद्दशायां च निधनं जातकस्य न संशयः। खण्डे स्थिरदशायां च चिन्तनीयं प्रयत्नतः॥८३॥ तो उस राशि की दशा में मृत्यु कहना चाहिए॥८३॥ पापराशेस्त्रिकोणेषु द्वादशाष्टमराशिषु। पापाक्रान्ते तद्दशायां निधनं भवति ध्रुवम्॥८४॥ पापग्रह की राशि से त्रिकोण में अथवा १२।८वीं राशि में पापग्रह हो तो उस राशि की दशा में मृत्यु होती है॥८४॥ शुभमध्ये मृतिर्नैव पापमध्ये मृतिर्भवेत्। भूयोऽपि निधनार्थाय राशिदोषं वदाम्यहम्॥८५॥ शुभग्रह के मध्य की राशि में मृत्यु नहीं होती है और पापग्रह के मध्य की राशि की दशा में मृत्यु होती है। फिर भी निधन राशि के दोष को कह रहा हूँ॥८५॥ द्वादशाष्टमपत्योश्च दृष्टौ क्षीणेन्दुशुक्रयोः। तद्दशायां च निधनं भवत्येव न संशयः॥८६॥ १२।८ के स्वामी क्षीणचन्द्र और शुक्र से देखे जाते हों तो उनकी दशा में निधन होता है॥८६॥ क्षीणेन्दोः केवलं दृष्टिः शुक्रदृष्टिश्च केवलम्। दृष्टिमात्रेण निधनं स्थिरदशायां विचिन्तयेत्॥८७॥ केवल क्षीणचन्द्र और शुक्र के दृष्टि भाव से स्थिर दशा में मृत्यु होती है॥८७॥ मृत्युस्थाने तु या दृष्टिः पापमध्यर्क्षं प्रपश्यति। तस्य दशां समालोक्य व्योमषष्ठाधिपाद्द्विज॥८८॥ पापग्रह के मध्य में स्थित अष्टम स्थान को पूर्वोक्त (क्षीण चन्द्र वा शुक्र) वा १०, ६ भाव के स्वामी देखते हों तो इसकी दशा में॥८८॥ निरीक्षते नवांशेषु द्वयोः स्थाने द्विजोत्तम। तत्रैव निधनं ज्ञेयं भाषितं च तवाग्रके॥८९॥