बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथवा १०, ६ के स्वामी से देखी जाती हुई अष्टमस्थ पापद्वयमध्यस्थित राशि की अन्तर दशा में निधन होता है।।८९।। पूर्वोक्तनिधनस्थाने महापाकं नरेष्वपि। व्योमषष्ठाधिपौ विप्र तयोरंशं निरीक्षिते।।९०।। राशेरन्तर्दशाकाले निधनं भवति ध्रुवम्। अन्तर्दशायां रूपे द्वे निधनस्थानमेव च।।९१।। पूर्वोक्त निधन स्थान के समय महादशा मे १०, ६ भावों के नवांशराशि के अन्तर में निधन होता है।।९०-९१।। इति आयुर्दायप्रकरणम्। अथ मारकप्रकरणम् पराशर उवाच- अथातः सम्प्रवक्ष्यामि निधनार्थे विशेषतः। प्रकारान्तर्दशायास्तच्च रुद्राद्द्विजसत्तम।।१।। अब मै विशेषकर निधन के सम्बंध में दशा-अन्तर्दशा के विषय में रुद्रग्रह द्वारा कह रहा हूँ।।१।। लग्नद्यूनाष्टमेशौ यौ तयोर्मध्ये च यो बली। प्राणीरुद्रः स विज्ञेयः निधनार्थे विचिन्त्यताम् ।।२।। लग्न और सप्तम से जो अष्टमेश उनमें जो बली हो वही रुद्रग्रह होता है।।२।। तयोर्मध्ये बली चिन्त्यः शुभदृष्टेन संयुते। दुर्बलः सोऽपि गौणाख्यो रुद्रग्रह इतीर्यते।।३।। वह शुभ दृष्ट वा शुभ युक्त हो तो बली होता है।।३।। तत्रैव प्राणिरुद्रस्य विशेषं गणयेत्फलम्। प्रवक्ष्यामि तवाग्रे च शृणुष्व त्वं महामते।।४।। जो दुर्बल है वह भी रुद्रग्रह होता है।।४।। शुभैर्युक्ते शुभैर्दृष्टे शुभसम्बन्धकारकः। प्राणीरुद्रः स विज्ञेयस्तत्सीमांतमायुरेव च।।५।। कारक यदि शुभग्रह से युक्त हो, शुभदृष्ट हो वा संबंध करता हो, बली हो तो वह रुद्रग्रह होता है। रुद्र शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।५।।