बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ मारकप्रकरणम् २९३ रुद्रशूलान्तमायुः स्यात् त्रिकोणान्ते तथा पुनः। लग्नान्ते पञ्चमान्ते च नवमान्ते त्रयस्थले ।।१६।। अथवा उसके त्रिकोण राशि पर्यन्त आयु होती है। लग्नान्त, पंचमान्त और नवमांत इन्हीं तीनों को त्रिकोणांत समझना चाहिए।।१६।। चिन्तनीयं महाप्राज्ञ तत्तद्राशिदशान्तरे। अल्पमध्यं च दीर्घायुर्योगभेदा न संशयः ।।१७।। तत्राप्यायुःसमायोगे त्रिकोणमध्यमोत्तरे। आयुस्तत्रैव विज्ञेयं तदग्रे च क्रमेण च ।।१८।। योगे मध्यायुषं प्राप्ते त्रिकोणे मध्यमान्तगे। आयुर्दायसमाप्तिश्च निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१९।। दीर्घायुर्योगसंलब्धे त्रिकोणे नवमान्तगे। दशान्तरे महाप्राज्ञ आयुर्दायसमाप्तये ।।२०।। इन्हीं खंडों में अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु के भेदों को समझना चाहिए। लग्न से पंचमांत अल्पायु, नवमान्त पर्यन्त मध्यमायु और इसके बाद दीर्घायु को समझना चाहिए।।२०।। अथैवं लग्नद्यूनादि आरभ्य च दशाक्रमः। प्रवृत्तिर्जन्मतो ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।२१।। इसी प्रकार लग्न सप्तमादि से आरम्भ कर दशाक्रम जन्म से ही जानना चाहिए।।२१।। यत्र रुद्रग्रहस्यापि शुभदत्वं न भाव्यते। तत्र जीवस्य नष्टत्वान्नेदं फलमिति स्थितिः ।।२२।। जिसमें रुद्रग्रह का भी शुभदत्व नहीं होता है, वहाँ पर जीव के नष्ट हो जाने से उपरोक्त फल नहीं होता है।।२२।। अथैव रुद्रशूलान्तमायुर्दायेति कारणे। योगेऽस्मिंश्च समुत्कर्षात्किञ्चिद्दर्शयति द्विज ।।२३।। इसी प्रकार से रुद्रशूलान्त आयुर्दाय होने का जो कारण होता है, उसका कारण कह रहा हूँ।।२३।।