बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ मारकप्रकरणम् २९३ रुद्रशूलान्तमायुः स्यात् त्रिकोणान्ते तथा पुनः। लग्नान्ते पञ्चमान्ते च नवमान्ते त्रयस्थले ।।१६।। अथवा उसके त्रिकोण राशि पर्यन्त आयु होती है। लग्नान्त, पंचमान्त और नवमांत इन्हीं तीनों को त्रिकोणांत समझना चाहिए।।१६।। चिन्तनीयं महाप्राज्ञ तत्तद्राशिदशान्तरे। अल्पमध्यं च दीर्घायुर्योगभेदा न संशयः ।।१७।। तत्राप्यायुःसमायोगे त्रिकोणमध्यमोत्तरे। आयुस्तत्रैव विज्ञेयं तदग्रे च क्रमेण च ।।१८।। योगे मध्यायुषं प्राप्ते त्रिकोणे मध्यमान्तगे। आयुर्दायसमाप्तिश्च निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१९।। दीर्घायुर्योगसंलब्धे त्रिकोणे नवमान्तगे। दशान्तरे महाप्राज्ञ आयुर्दायसमाप्तये ।।२०।। इन्हीं खंडों में अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु के भेदों को समझना चाहिए। लग्न से पंचमांत अल्पायु, नवमान्त पर्यन्त मध्यमायु और इसके बाद दीर्घायु को समझना चाहिए।।२०।। अथैवं लग्नद्यूनादि आरभ्य च दशाक्रमः। प्रवृत्तिर्जन्मतो ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।२१।। इसी प्रकार लग्न सप्तमादि से आरम्भ कर दशाक्रम जन्म से ही जानना चाहिए।।२१।। यत्र रुद्रग्रहस्यापि शुभदत्वं न भाव्यते। तत्र जीवस्य नष्टत्वान्नेदं फलमिति स्थितिः ।।२२।। जिसमें रुद्रग्रह का भी शुभदत्व नहीं होता है, वहाँ पर जीव के नष्ट हो जाने से उपरोक्त फल नहीं होता है।।२२।। अथैव रुद्रशूलान्तमायुर्दायेति कारणे। योगेऽस्मिंश्च समुत्कर्षात्किञ्चिद्दर्शयति द्विज ।।२३।। इसी प्रकार से रुद्रशूलान्त आयुर्दाय होने का जो कारण होता है, उसका कारण कह रहा हूँ।।२३।।
२९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्राणीरुद्रशुभैर्दृष्टे पूर्वोक्तफलदायकः। शुभयोगे न सन्देहो रुद्रशूलान्तमायुषि।।१४।। यदि रुद्रग्रह शुभ दृष्ट हो तो पूर्वोक्त फल को देने वाला होता है और शुभ युक्त हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है, इसमें संदेह नहीं है।।१४।। स्थित एव फलं जन्म कथितं कारणान्तरे। निरुक्ते शुभसंयोगे किं कीर्तयति भो द्विज ।।१५।। पूर्वमेवं फलं सांधो समुत्कृष्टे तदेव चेत्। सुतरां तदेव वक्तव्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१६।। कारणान्तर से पूर्वोक्त फल होता है किन्तु शुभयोग में कोई कारणांतर नहीं होता है।।१६।। अनेन पूर्वयोगेन फलं किञ्चिद्धि न्यूनता। आद्योदितादुक्तकालात्पूर्वं पश्चान्मृतिर्यदि ।।१७।। निरुक्तयोगश्च तदा ह्यपवादं वदाम्यहम्। रविं विहाय नितरां पापयोगो भवेद्द्विज ।।१८।। इसमें भी यदि पूर्वोक्त फल यदि उत्कृष्ट हो तो वही होता है। यदि पूर्वोक्त फल में कुछ न्यूनता हो और उसके पूर्व पीछे मृत्यु हो जाय तो यह योग निष्फल होता है।।१८।। योगोऽयं निष्फलो वाच्यः पुरा ब्रह्मप्रणोदितः। इदं फलं न भवति योगेऽस्मिन्द्विजसत्तम।।१९।। नाशयोगस्य वक्तव्यं फलं वापि भयङ्करम्। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि गौणरुद्रस्य वै द्विज ।।२०।। किन्तु नाश होने के योग का फल भयंकर होता है। अब मैं गौणरुद्र का विवेचन कर रहा हूँ।।१९-२०।। गुणप्रकर्षेण फलं विशेषेण तवाग्रतः। गौणरुद्रे महाप्राज्ञ मन्दारेन्दुनिरीक्षिते ।।२१।। अब मैं गुण की प्रकर्षता से फल-विशेष को कह रहा हूँ। गौणरुद्र शनि, भौम, चन्द्र से देखा जाता हो।।२१।। अभावे शुभयोगस्य पापयोगोत्तरे तथा। शूलान्तात्फल विप्रेन्द्र आयुर्दायं भवत्यपि ।।२२।।
अथ मारक प्रकरणम्। २९५ शुभग्रह का योग न हो, पापयोग भी न हो, वा पाप योग हो अथवा भौम, शनि, चन्द्रमा के साथ और भी शुभग्रह की दृष्टि हो तो रुद्रा- श्रित राशि की अग्रिम राशि की दशा में मृत्यु होती है।।२२।। शुभदृष्टे वा शूलान्तात्परञ्चायुर्भवेदपि। योगद्वयपरत्वेन योजनीयं न संशयः।।२३।। शुभग्रह के योग के अभाव में पापग्रह का योग होते हुए दोनों योगों का एक के बाद दूसरे का विचार करना चाहिए।।२३।। एतद्योगद्वयं किञ्चिन्न्यूनतायामपि द्विज। नेदं फलं प्रवक्तव्यं मैत्रेय भाषितं पुरा।।२४।। इन दोनों के योगों के न्यून होने से पूर्व का फल नहीं होता है।।२४।। शुभदृष्टिभवे चैव योगे च परपूर्ववत्। शुभदृष्टावसन्त्यां च पापयोगाद्यभावतः।।२५।। शुभ दृष्टि होते हुए अथवा शुभ दृष्टि के अभाव में पापयोगादि के अभाव में शुभ दृष्टि के होते हुए एक योग होता है।।२५।। कृत एको हि योगश्च पूर्वयोगजमेव च। अशुभयोगे शुभदृष्टौ योगोऽयमपरो द्विज।।२६।। पापग्रह के योग में शुभ दृष्टि के होते हुए दूसरा योग होता है।।२६।। पापयोगैरभावे च शुभदृष्टौ च संयुते। १कैमुतिकाख्यन्यायेन सिद्धो योगस्तृतीयकः।।२७।। पाप योग के अभाव में शुभ दृष्टि होते हुए कैमुतिक न्याय से तीसरा योग भी होता है।।२७।। पुरा प्रोवाच यच्छम्भुस्तवाग्रे कथयाम्यहम्। द्वितीययोजनायां तु शुभदृष्टिसमन्विते।।२८।। पूर्व में शम्भु ने जो कहा था उसे मैंने तुमसे कहा। दूसरे योग में पापयोग शुभदृष्टि में।।२८।। पापयोगस्य चाभावे योगः प्रथम उच्यते। पापयोगे महाप्राज्ञ शुभदृष्टे प्रभावके।।२९।। १. कैमुतिकन्याय अर्थापत्ति को कहते हैं, जैसे चूहा लकड़ी को खा गया तो इससे मृदुपदार्थ मिठाई आदि को भी खा सकता है।
२९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पापग्रह के योग के अभाव में प्रथम योग और पापग्रह योग में शुभदृष्टि में दूसरा ॥२९॥ द्वितीययोगपक्षेऽहं पूर्वस्मिन् द्विजसत्तम। पापयोगस्य चाभावे पापदृष्टिविवर्जितः॥३०॥ अथवा पापयोग के अभाव में पापदृष्टि के न होने में॥३०॥ कैमुतिकाख्यन्यायेन तृतीयो योग उच्यते। अथैवं प्राणिरुद्रस्य ह्युक्ता पक्षान्तरे कथा॥३१॥ कैमुतिकन्याय से यह तीसरा योग हुआ। यह प्राणीरुद्र के पक्षान्तर से स्वरूप कहा है॥३१॥ तत्रैव प्रथमे योगे शुभदृष्टिविवर्जिते। शुभयोगादियोगश्च द्वितीयोक्तेन योगकृत्॥३२॥ प्रथम योग में शुभ दृष्टि से रहित होने में शुभादि योग होने से॥३२॥ तृतीयेन द्वयस्यापि योगभङ्गं करोत्यपि। अधुनोक्तत्रयाभावे मन्दादिदृष्टिमात्रतः॥३३॥ तीसरे से दूसरे के साथ योग होने से तथा उक्त तीनों योगों के अभाव में शन्यादि दृष्टि के भेद से निर्विशंक कह रहा हूँ॥३३॥ एवं स्थिते सुयोगश्च निःशङ्कं प्रतिपाद्यते। अशुभैः खेचरैर्दृष्टे पापयोग इति स्थितिः॥३४॥ अशुभ ग्रह की दृष्टि और पापयोग॥३४॥ शुभयोगविहीने च मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। तदायुः परतो विप्र समानादिति योजयेत्॥३५॥ शुभ योग से हीन शनि, भौम, चन्द्र से दृष्ट हो तो रुद्रशूल के बाद तक आयु होती है॥३५॥ प्रथमे द्वितीये सन्तः पापयोगैरभावतः। योगो भङ्गमपेक्षा च तृतीयोक्तमिदं वदेत्॥३६॥ प्रथम, द्वितीय योग में पापयोग के अभाव में योग भंग होने से तीसरे योग की उत्पत्ति होती है॥३६॥
अथ मारक प्रकरणम्। २९७ पापदृष्टिमात्रमेवं योगनिर्वाहकारणे। अपवादविहीनेन इत्येवोक्तं तृतीयेके।।३७।। केवल पापग्रह मान्य की दृष्टि से योग होने के कारण तीसरा योग होता है।।३७।। रुद्राभ्यां प्राणिगौणाभ्यां ताभ्यामाश्रितमेव च। गुणविशेषे आयुरन्तं वक्ष्यामीह महामते।।३८।। अब दोनों रुद्रों से और उनके आश्रित गुण-विशेष से आयु का निर्णय कर रहा हूँ।।३८।। गौणरुद्रे शुभैर्योगेशुभदृष्टिसमन्विते। रुद्रशूलान्तमायुश्च योजनीयं द्विजोत्तम।।३९।। गौणरुद्र शुभ ग्रह से योग करता हो और शुभदृष्टि से युक्त हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है।।३९।। पूर्वोक्त प्राणिरुद्रेण द्वियोगप्राणकेन च। द्वाभ्यां शूलान्तमायुश्च तवाग्रे कथितं मया।।४०।। पूर्वोक्त बली (प्राणि) रुद्र से जो दो योग कहे हैं उनमें दोनों रुद्रों की शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।४०।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि द्वयोर्निर्वाहकारणम्। तयो रूपं भिन्नभिन्नं शृणुष्व मुनिसत्तम।।४१।। अब दोनों के निर्वाह के कारण कह रह हूँ। दोनों के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं।।४१।। प्राणिरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं द्विजसत्तम। शुभयोगेति का वार्ता शूलान्तायुर्विनिश्चितम्।।४२।। प्राणिरुद्र शुभग्रहों से देखा जाता हो और शुभयोग हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है।।४२।। गौणरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं क्लेशदायकः। रोगशोकभयं कर्त्ता मृत्युं नैव करोति च।।४३।। गौणरुद्र शुभग्रहों से दृष्ट हो तो क्लेशदायक, रोग-शोकदायक तथा भयकारक होता है, न कि मृत्युकारक।।४३।। शुभयोगे महाप्राज्ञ योगोऽयं बलवत्तरः। तस्य शूलान्तमायुश्च निर्विशङ्कं न संशयः।।४४।।
२९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि इस योग में शुभयोग भी हो तो निश्चय ही इसके शूलान्त पर्यन्त आयु होती है॥४४॥ उभौ रुद्रौ शुभैर्दृष्टावथवा योगद्वयोरपि। शुभग्रहेण क्लेशश्च रुद्रशूलान्तमायुषि॥४५॥ दोनों रुद्र शुभ ग्रहों से दृष्ट और योग करते हों तो रुद्रशूलान्त आयु न हाकर केवल क्लेशमात्र होता है॥४५॥ प्राणी चाप्राणिरुद्राभ्यां कृतयोगद्वयेन च। तयोर्वा सम्प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम॥४६॥ बलवान् या निर्बल रुद्रों से दोनों योगों में जो विशेषता होती है, उसे कह रहा हूँ॥४६॥ मार्त्तण्डरहितो चान्यः पापयोगकृते द्विज। योगद्वयं न भवति पापयुक्तं द्वयोरपि॥४७॥ दोनों रुद्रों के दोनों योगों में सूर्य को छोड़कर अन्य पापग्रह योग करते हों तो दोनों योग नहीं होते हैं॥४७॥ शुभयोगः शुभैर्दृष्टेरुभयेऽपि विना रविम्। पापयोगकृते विप्र भययोगो विनश्यति॥४८॥ शुभयोग शुभग्रह से दृष्ट दोनों हों तो पापग्रह से उत्पन्न भययोग निवृत्त हो जाता है॥४८॥ शुभयोगः शुभदृष्टिरभावे न भवत्यपि। यत्रायुः कथयाञ्चक्रुर्वक्तव्यं द्विजसत्तम॥४९॥ शुभयोग शुभदृष्टि के अभाव में भी कुछ नहीं होता है॥४९॥ उभयोः पापयोगे च कश्चिद्रोगार्तिको भवेत्। क्लेशः शोको नृपाद्भीतिः देशपर्यटनं द्विज॥५०॥ यदि दोनों पाप योग करते हों तो कुछ रोग आदि होते हैं, क्लेश, शोक, राजा से भय, देशपर्यटन होता है॥५०॥ शुभदृष्टेरभावे च शुभयोगविवर्जिते। पापयोगप्रभावेण मरणं सारणं दृशा॥५१॥ शुभदृष्टि के अभाव में शुभयोग के बिना पापयोग के प्रभाव से मरण होता है॥५१॥
अथ मारकप्रकरणम्। २९९ शुभयोगदृष्टचभावे पापयोगे द्विजोत्तम। शुभवर्गो पापवर्गो तवाग्रे कथयाम्यहम्।।५२।। अब मैं शुभ वर्ग और पाप वर्ग को कह रहा हूँ।।५२।। अर्कारमन्दफणिनः क्रमात् क्रूरायथाक्रमम्। चन्द्रोऽपि क्रूर एवात्र क्वचिदङ्गारकाश्रयात् ।।५३।। सूर्य, भौम, शनि और राहु ये यथाक्रम से क्रूर होते हैं। चन्द्रमा भी कभी भौम के संसर्ग से क्रूर होता है।।५३।। गुरुःकविशिखिज्ञाश्च यथापूर्वं शुभग्रहाः। क्रूरखेटा महाप्राज्ञ चार्काद्या उत्तरोत्तरम्।।५४।। गुरु, शुक्र, केतु और बुध ये यथाक्रम से शुभग्रह हैं। सूर्यादि ग्रह क्रूर होते हैं।।५४।। क्रूराः क्रूरभगाश्चैव महत्क्रूरा भवन्ति च। शुभक्षेत्रगतैः क्रूरैः क्रूरता ह्युपशाम्यति।।५५।। क्रूर ग्रह क्रूरग्रह की राशि में हों तो बड़े क्रूर होते हैं। शुभग्रह की राशि में क्रूरग्रह हों तो उनकी क्रूरता शान्त हो जाती है।।५५।। गुर्वादयः शुभग्रहा यथापूर्वं बुधः कविः। कवितः केतु विज्ञेयः केतुतो वाक्पतिर्द्विज।।५६।। गुरु आदि शुभग्रह बुध से शुक्र यथापूर्वं बली होते हैं। शुक्र से केतु और केतु से गुरु क्रम से उत्तरोत्तर बली होते हैं।।५६।। क्रमेणैव विजानीयाच्छुभखेटोत्तरोत्तरम्। यथापूर्वं क्रूरग्रहाः क्रूराश्रयसमागते।।५७।। इसी क्रम से क्रूरग्रह क्रूरराशि में यथाक्रम से बली होते हैं।।५७।। एवं क्रौर्यं समापन्नं क्रौर्यं तु शोभनाश्रयः। एवं गुर्वादि सौम्याश्च शुभाः श्रेयातिशोभनाः।।५८।। एवं गुरु आदि शुभग्रह भी शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।५८।। क्रूराश्रये सौम्यखेटाः सौम्यता नश्यते क्वचित्। एवमेवापरांयुक्तिं कथयामि द्विजोत्तम।।५९।। कभी-कभी क्रूरग्रह की राशि में गये हुए शुभग्रह अपनी शुभता को नाश कर देते हैं।।५९।।
३०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रत्येकं शुभराशिस्थो उच्चस्थो वा बुधः शुभः। गुरुशुक्रौ च सौम्यस्थौ ततोऽन्ये च शुभाः स्मृताः।।६०।। प्रत्येक शुभराशि में वा अपनी उच्चराशि में बुध शुभद होता है एवं गुरु-शुक्र शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।६०।। पूर्वस्मिन् पापयोगेन योगभङ्गद्वये द्विज। निरूपितं तवाग्रे च निर्विशङ्कं न संशयः।।६१।। एवं पूर्वोक्त पापग्रह के योग से दोनों पूर्वोक्त भंग योग कहा गया है।।६१।। योगद्वयेऽपि भङ्गार्थे पापदृष्टौ विशेषकम्। न दर्शयति कदापि स्यात् तवाग्रे कथयामि वै।।६२।। किन्तु दोनों योगों में विशेषतः पापदृष्टि अपेक्षित है।।६२।। शुभग्रहाणामभावे मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। पापयोगे शुभैर्दृष्टे परतश्चायुषि द्विज।।६३।। प्राणिरुद्रेऽप्यगौणेन शुभयोगविवर्जिते। पापयोगेऽथवा दृष्टे तथा शुभनिरीक्षिते।।६४।। शुभग्रहों की दृष्टि न हो, शनि, भौम, चन्द्रमा देखते हों अथवा पापग्रह का योग वा दृष्टि हो, शुभग्रह देखता हो तो पूर्ववत् तारतम्य से फल का विचार करना चाहिए।।६४।। व्यापारतानुविज्ञेया पूर्ववद्द्विजसत्तम। अत्रोपपदपापाच्च राहोरप्युपलक्षणम्।।६५।। इसी प्रकार उपपद की चर्चा से राहु की चर्चा से उपलक्षण मात्र है।।६५।। एवं सूर्यातिरिक्तोऽपि पापयोगस्तथैव च। तस्यैवेहानुवादाच्च राहोश्चोपबृंहणात्।।६६।। सूर्य के अतिरिक्त पापग्रह के योग से भी योग होता है।।६६।। परिग्रहदर्शनाच्च परतो रुद्रमाश्रयात्। शुभस्थाने आयुरन्तः शूलत्रयमलङ्घनात्।।६७।। इन परिग्रहों के रहते हुए रुद्रग्रह के आश्रय से शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।६७।।
अथ मारकप्रकरणम्। ३०१ न तु शूलदशायां च आयुरन्तं द्विजोत्तम। एवं शूले चेत्तदन्तशूलरीत्येति बाधके॥६८॥ किन्तु शूल में मृत्यु न होकर उसके अन्त में मृत्यु होती है॥६८॥ पूर्वोक्तपापयोगेन शुभयोगेन दृष्टितः। कृतयोगद्वयस्यापि भङ्गार्थे च वदाम्यहम्॥६९॥ पूर्वोक्त दोनों योगों के भंग के लिए कह रहा हूँ। शुभग्रह का योग होने से पापग्रह का योग दुर्बल हो जाता है॥६९॥ शुभयोगेन वै विप्र पापयोगोऽतिदुर्बलः। शुभदृष्टिकृतो योगः पापदृष्टे कथं क्षमः॥७०॥ एवं शुभ दृष्टि होते हुए पापग्रह की दृष्टि कैसे समर्थ हो सकती है॥७०॥ न भञ्जनसमर्थश्च कोटियत्ने कृते द्विज। शुभकृद्योगभङ्गार्थे पापयोगमपेक्षितम्॥७१॥ शुभग्रहजनित योग के भंग के लिए पापग्रहजनित योग होना आवश्यक है ॥५६-७१॥ शुभयोगे दृष्टिकृते पापयोगोऽपि भञ्जकः। शुभदृष्टिकृते योगः पापयोगो विनश्यति॥७२॥ शुभग्रह का योग वा दृष्टि होने से पापयोग का भंग हो जाता है॥७२॥ यदायुर्दायमध्यस्थं वेदितव्यं द्विजोत्तम। पापमात्रस्य शूलत्वे प्रथमर्क्षे मृतिं वदेत्॥७३॥ केवल पापयोग की दृष्टि मात्र ही हो तो प्रथम शूल में ही मृत्यु होती है॥७३॥ द्वौ रुद्रौ पूर्ववक्ष्येऽहं यदि चैकत्र संस्थितौ। मित्रंमध्यमशूलर्क्षे शुभमात्रेऽन्तिमे मृतिः॥७४॥ पूर्वोक्त दोनों रुद्र यदि एक ही स्थान में हों तो मध्यम शूल में मृत्यु होती है॥७४॥ द्वयोः पापे च प्रथमे शूले मृत्युर्भवत्यपि। यद्येकरुद्रः पापी च द्वितीयः शुभखेचरः॥७५॥
३०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि एक रुद्र पापी हो और दूसरा शुभ हो तो मध्य शूल में मृत्यु होती है।।७५।। मध्ये शूले मृतिर्विप्र निर्विशङ्कं भविष्यति । शुभग्रहद्वयं विप्र एकत्र यदि तिष्ठति ।।७६ ।। और शुभमान्य का संबंध हो तो तीसरे शूल में मृत्यु होती है।।७६ ।। अन्तशूले मृतिर्ज्ञेया शूलिना भाषितं पुरा। एवं भेदानुभेदेन विद्यात् सर्वत्र बुद्धिमान् ।।७७।। इस प्रकार के भेदानुभेद से सर्वत्र विचार करना चाहिए। यह आवश्यक है कि दोनों रुद्र पाप वा शुभ हों ।।७७।। शूलक्षेत्रे च द्वौ रुद्रौ यदि पापोऽथवा शुभः । मिश्रग्रहोऽथ वा विप्र चिन्तयेद्बलवत्तरः ।।७८ ।। वा मिश्रग्रह हैं और दोनों में बली कौन ।।७८।। दीर्घायुरायुरयोगेन भङ्गाभावे द्विजोत्तम । मृत्युः शूलदशायां च पापयोगं विना रविः ।।७९।। दीर्घायु योग में भंग के अभाव में रवि के बिना अन्य पापग्रहों के योग होने से शूल दशा में मृत्यु होती है।।७९ ।। क्रूराश्च येषु क्षेत्रेषु शुभानामाश्रयेषु च । निर्वाणमितरेषां तु शूलर्क्षे निर्दिशेदयम् ।।८०।। क्रूरग्रह जिस राशि में शुभग्रह के आश्रय से हों तो यह निर्याण अन्य ग्रहों के शूल में कहना चाहिए।।८०।। शुभानामत्र पक्षे तु तथा क्रूराश्रयेषु च। तस्मिन् जातकशूलर्क्षे मृतिं ब्रूयान्न संशयः ।।८१।। शुभग्रहों के पक्ष में क्रूरग्रहों के आश्रय में शूलर्क्ष में जातक की मृत्यु होती है।।८१।। यद्यप्राणिरुद्रयोगे यत्किञ्चिन्न्यूनता द्विज। तर्हि रुद्राश्रयं तच्च त्रिधा न परतोऽपि च ।।८२।। यदि निर्बल रुद्र के योग में कुछ न्यूनता हो तो रुद्राश्रय के द्वारा मृत्यु का विचार करना चाहिए।।८२।। रुद्राश्रयेऽपि चायुर्दा समाप्तिर्भवति ध्रुवम् । प्रायेण चिन्तयेद्विप्र पूर्वापरप्रयत्नतः।।८३।।
अथ मारकप्रकरणम् ३०३ रुद्राश्रय में भी आयु की समाप्ति होती है।।८३।। यद्बाह्यप्राणिरुद्रस्य योगे पूर्णे भवत्यपि। रुद्रशूलपरत्वेन आयुर्दायसमाप्तये।।८४।। जो बाह्य प्राणीरुद्र के योग में पूर्ण आयु होने स रुद्रशूलान्त आयु कहा है।।८४।। रुद्राश्रयेण प्रायेण शूलमेकद्वयं त्रयम्। उल्लङ्घनं कृतं विप्र यदि योगविशेषता।।८५।। तथा रुद्राश्रय से प्रायः एक, दो वा तीसरे शूल का उल्लंघन योग-विशेष से किया है तो वह प्रायः रुद्राश्रय से ही होता है।।८५।। तर्हि रुद्राश्रयेणैव प्रायेणायुर्भवेद् ध्रुवम्। तावद्वर्षेण कथनं जीवनं जातकस्य च।।८६।। अतः उतना ही वर्ष जातक का जीवन कहना चाहिए।।८६।। इत्युक्तं च प्रयाणे च पूर्वं रुद्राश्रयाद्द्विज। आयुर्योगसमाप्तिश्च कष्टयोगादिकारकम्।।८७।। उक्त योगादि निधन को प्रायः रुद्र के आंश्रय से कहा है।।८७।। रुद्राश्रयात्तु ह्येवं च निरुक्तं चायुषि द्विज। किञ्चिद्विशेषरूपं च तवाग्रे दर्शयामि च।।८८।। अब कुछ विशेष रूप से कह रहा हूँ।।८८।। मेषलग्ने विशेषेण आयुरुद्राश्रयान्तके। कुष्ठरोगादि कुर्वीत पूर्णायुर्न समाप्यते।।८९।। मेष लग्न में रुद्राश्रयांत में कुष्ठरोगादि होता है और पूर्णायु को नहीं भोगता है।।८९।। द्वन्द्वराशौ स्थितौ रुद्रौ प्राणी गौणद्वयेऽपि वा। रुद्राश्रये तदन्ते वा आयुर्दायं भवत्यपि।।९०।। मिथुन राशि में रुद्र हो तो रुद्राश्रय में वा उसके अंत में आयु की समाप्ति होती है।।९०।। आयुर्वा योगभेदेन प्रथमे मध्यमोत्तमे। दर्शयामि तवाग्रे च कथां शम्भुप्रचोदिताम्।।९१।। पूर्व में जो अल्पायु, मध्यमायु और दीर्घायु योग कहा है।।९१।।
३०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् स्वल्पायुः प्रथमे शूले मध्यमायुर्द्वितीयके । दीर्घायुश्च तृतीयान्ते शूले च निधनं भवेत् ।।९२।। उसमे अल्पायु हो तो प्रथम शूल में, मध्यायु हो तो द्वितीय शूल में और दीर्घायु हो तो तृतीय शूलांत तक आयु होती है ।।९२।। ततो फलविशेषार्थं माहेश्वरग्रहं द्विज। लक्षयन्ति तवाग्रे च तस्मादायुर्विनिश्चितम् ।।९३ ।। ग्रह का निर्णय कह रहा हूँ।।९३।। चिन्तयेत्कारके लग्ने ह्यष्टमेशो महेश्वरः। अथैवान्यप्रकारेण माहेश्वरं वदाम्यहम् ।।९४।। आत्मकारक से अष्टमेश महेश्वर ग्रह होता है। अन्य प्रकार से माहेश्वर ग्रह को कह रहा हूँ।।९४।। कारके तुङ्गराशिस्थे स ग्रहो बलवत्तरः। रिःफरन्ध्राधिपोर्मध्ये सोऽपि माहेश्वरो ग्रहः ।।९५।। कारकाच्च ग्रहाभावे नाथो माहेश्वरो भवेत् । रिष्फरन्ध्राधिपौ विप्र बले सामान्यतां यदि ।।९६ ।। आत्मकारक अपनी उच्चराशि में हो तो आत्मकारक से १२, ६ वें भाव के स्वामियों में जो बली हों वही महेश्वरग्रह होता है।।९५-९६।। द्वयं माहेश्वरं यातो यथा रुद्रग्रहौ द्वयम्। ताभ्यां च निर्णयार्थाय प्रकारान्यं वदाम्यहम् ।।९७ ।। यदि दोनों में बल की समानता हो तो दोनों माहेश्वर होते हैं।।९७।। स्वकारकस्य योगश्चेद्राहुकेतुरवीन्विना। माहेश्वरो भवत्येव विकल्पेन द्विजोत्तम ।।९८।। यदि आत्मकारक के साथ राहु-केतु हों।।९८।। कारकस्याष्टमे पापग्रहो माहेश्वरो भवेत् । रविचन्द्रौ च चान्द्रिश्च गुरुः शुक्रः शनिस्तमः ।।९९।। अथवा आत्मकारक से आठवें हों तो कारक से षष्ठेश रवि, चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।।९९।। शिखिना गणनायां च यः षष्ठः कारकग्रहात्। सोऽपि माहेश्वरो ज्ञेयो नवभागसमुच्चयात् ।।१००।। तथा केतु में से जो छठे हो वह माहेश्वर होता है।।१००।।
अथ मारकप्रकरणम् ३०५ माहेश्वरग्रहस्यापि ब्रह्मसाहित्यकेन च। ततो ब्रह्मग्रहं वक्ष्ये विशेषेण फलाय वै॥१॥ माहेश्वर ग्रह के अनुसार ही ब्रह्मग्रह की भी परिचर्या होने के कारण ब्रह्मग्रह का विचार कह रहा हूँ॥१॥ लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि रिपुरन्ध्रव्ययाधिपाः। एतेषु बलवान्विप्र मेषादिविषमस्थिते॥२॥ लग्न वा उससे सप्तम इन दोनों में जो बलवान् हो, उससे ६।८।१२ भाव के स्वामियों में जो बलवान् हो, वह मेषादि विषम राशियों में हो॥२॥ लग्नसप्तमयोर्मध्ये राशेश्च बलवान्भवेत्। उच्चैरपृष्ठभागाद्यः संयोगो विद्यमानतः॥३॥ और लग्न वा सप्तम के पृष्ठभाग में उक्त तीनों गुणों से युक्त हो तो वह ब्रह्मग्रह होता है॥३॥ एतद्गुणत्रयाद्युक्तः सोऽपि ब्रह्माग्रहः स्मृतः। लग्नस्य पृष्ठभागं च द्यूनाल्लग्नावधिर्द्विज॥४॥ सप्तम से लग्न पर्यन्त ६ भाव लग्न का पृष्ठ भागं॥४॥ सप्तमस्य पृष्ठभागं षट्कलग्नादिकं द्विज। बलवान्विषमस्थोऽपि ब्रह्माखेटः स उच्यते॥५॥ और लग्न से सप्तम भाव के अन्दर सप्तम का पृष्ठभाग होता है॥५॥ ब्रह्मणालक्षणाक्रान्ते बलवान्वापि पातयोः। शनिराहुर्थो केतुर्यदि षष्ठो ग्रहो द्विज॥६॥ यदि ब्रह्मग्रह के लक्षण से युक्त शनि, राहु वा केतु हो तो इनमें जो बलवान् हो इनसे षष्ठेश ब्रह्मा होता है॥६॥ रव्यादिगणनायां च शन्यादौ तृतीयो ग्रहः। स्थानात्षष्ठराशिगे च षष्ठराश्यधिपोऽथवा॥७॥ सूर्यादि गणना से शनि आदि शनि से तीसरा ग्रह स्थान से षठा अथवा षष्ठेश॥७॥ सोऽपि ब्रह्माग्रहो ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। बहुना ब्रह्मणाक्रान्ते को ग्रहो ग्राह्यमाणकः॥८॥
३०६ ·बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि बहुत से ग्रह ब्रह्मा के लक्षण के हों तो वही ब्रह्मग्रह होता है, जिसका।।८।। सन्देहे निर्णयं चात्र तवाग्रे कथयामि च। द्व्यादिकः ग्रहाणां च योगो ब्रह्मेति लक्षितः।।९।। योगः स्वजातियो ग्राह्यः कारकं याति यो ग्रहः। बहूनामधिको भामः सोऽपि ब्रह्मा ग्रहोच्यते।।१०।। अधिक अंश होता है वही ब्रह्मा होता है।।१०।। राहुर्ब्रह्मत्वयोगेन अधिकारी यदा भवेत्। विपरीतं विजानीयात्सर्वेषु न्यूनभागकम्।।११।। यदि राहु ब्रह्मयोग का अधिकारी हो तो वहाँ विपरीत समझना चाहिए अर्थात् न्यूनांश वाला ही ब्रह्मा होता है।।११।। ईत्येकपापे पूर्वोक्तं ब्रह्मणा ग्रहकारकात्। रन्ध्राधीशोऽष्टमस्थो वा जात्यप्राणैक्यवाक्यतः।।१२।। अथवा आत्मकारक से अष्टमस्थ ग्रह वा अष्टमेश ब्रह्मा होता है।।१२।। द्वौ ब्रह्मा विपरीतार्थे ह्यथवा बहुब्रह्मणा। सामान्यभागान्तरे हि कतमो ग्राह्यमाणकः।।१३।। यदि पूर्वोक्त लक्षण से युक्त दो ब्रह्मा हों और अंशों में साधारण न्यूनाधिकता हो तो कौन-सा ग्रह ब्रह्मा होगा।।१३।। सर्वे भागसमानास्तु अग्रहात्सग्रहो बली। इति न्यायेन विज्ञेयं बलवान् ब्रह्मणोच्यते।।१४।। ब्रह्मत्वेन प्रधानेन ब्रह्मकार्यं करोत्यपि। स च ब्रह्मग्रहो ग्राह्यः पुरा शम्भुप्रचोदितः।।१५।। अथवा सभी के अंश समान हों तो जो ग्रह युक्त हो वही बली होता है, इत्यादि रीति से जो बलवान् हो वही ब्रह्मा होता है।।१४-१५।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्ममाहेश्वरस्य च। विशेषेण फलं सम्यगतवाग्रे द्विजनन्दन।।१६।। हे द्विजनंदन ! अब मै विशेष रूप से ब्रह्म और माहेश्वर ग्रहों के फल को तुमसे कह रहा हूँ।।१६।।
· अथ मारकप्रकरणम् ३०७ ब्रह्मग्रहाश्रितेशस्य दशादिः परिचिन्तयेत्। माहेश्वरर्क्षपर्यन्तं जातकस्यायुषि द्विज ।।१७।। ब्रह्मग्रहाश्रित राशि की दशा और माहेश्वर ग्रह की राशि की दशा को बनाना चाहिए। ब्रह्मग्रह की राशिदशा से माहेश्वर ग्रह की राशि दशा पर्यन्त ही जातक की आयु होती है ।।१७।। तत्तद्राशित्रिकोणेषु राशिरन्तर्गते मृतिः। चराच्च स्थिरपर्यन्तं दशायां चिन्तयेद्द्विज ।।१८।। दशाओं के त्रिकोण राशियों की अंतर्दशा में मृत्यु होती है। अतः चर से स्थिर राशि की दशा पर्यन्त यह विचार करना चाहिए ।।१८।। तथा महादशायां च आयुर्दायं विलोकयेत्। विंशोत्तार्यादिकं चैव यथान्यायेषु योजयेत् ।।१९।। तथा विंशोत्तरी महादशा और अंतर्दशा में भी आयु का विचार करना चाहिए ।।१९।। माहेश्वरस्य यो राशिरष्टमेशाश्रयी द्विज। तत्तद्राशित्रिकोणेषु राशावन्तर्गते मृतिः।।२०।। अथवा माहेश्वर से अष्टमेश के आश्रयीभूत जो राशि हो उस राशि से त्रिकोण राशि की अन्तर्दशा में मृत्यु होती है।।२०।। अत्राब्द इति निर्देशात्तत्तद्राशिदशाक्रमः। अब्दो द्वादशधाभागे अन्तरैकैकराशि च ।।२०।। यहाँ पर वर्ष दशाक्रम से लेना चाहिए और वर्ष में १२ का भाग देने से अन्तर्दशा का वर्ष होता है।।२१।। षष्ठाष्टमेशौ भवतो मारकावष्टमेश्वरः। प्रायेण मारको राशिदशास्त्वत्र विशेषतः।।२२।। षष्ठेश और अष्टमेश मारक होते हैं, किन्तु प्रायः अष्टमेश ही मुख्य मारक होता है।।२२।। षष्ठभे पापभूयिष्ठे षष्ठेशो मुख्यमारकः। षष्ठात् त्रिकोणगो वापि मुख्यमारक इष्यते ।।२३।। छठे स्थान में अधिक पापग्रह हों तो षष्ठेश ही मुख्य मारक होता है अथवा षष्ठेश से त्रिकोण राशि मारक होती है।।२३।।
३०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मध्यायुषि मृतिः षष्ठदशायामष्टमस्य वा। षष्ठात् त्रिकोणस्य पुनर्दीर्घाल्पविषये भवेत्।।२४।। यदि मध्यायु हो तो छठी वा आठवीं दशा में मृत्यु होती है। दीर्घायु और अल्पायु हो तो छठे से त्रिकोण की दशा में मृत्यु होती है।।२४।। षष्ठे बलयुते तस्य त्रिकोणे मृतिमादिशेत्। षष्ठेशश्चेद्बलाढ्यः स्यात् तत्रिकोणे मृतिं वदेत्।।२५।। यदि छठा स्थान बली हो तो उसके त्रिकोण में मृत्यु होती है। यदि षष्ठेश बलवान् हो तो उसके त्रिकोण में मृत्यु होती है।।२५।। व्यवस्थेयं समस्तापि कारकादिदशास्वपि। बलिनः शुक्रशशिनोग्राह्यं षष्ठाष्टमादिकम्।।२६।। यह व्यवस्था सभी कारक दशाओं में होती है। शुक्र-चन्द्रमा बली हों तों छठे, आठवें को लेना चाहिए।।२६।। इति रुद्रमाहेश्वरब्रह्मग्रहादि मारकाध्यायः। अथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः अधुना सम्प्रवक्ष्यामि पित्रादेश्च द्विजोत्तम। योगं निर्याणकाख्यातं यथा शम्भुप्रणोदितम्।।१।। हे द्विजोत्तम ! अब मै पित्रादिकों के मरण समय को कह रहा हूँ, जैसा कि शंकरजी ने कहा है।।१।। लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान्द्विज। तस्य राशेः समारभ्य क्रमेण पूर्ववद्द्विज।।२।। लग्न और सप्तम में जो राशि बलवान् हो उस राशि के अनुसार ।।२।। प्रवर्त्तकदशारीत्या रुद्रशूलदशान्तरे। भविष्यति पितुर्मृत्युर्निर्वशङ्कं द्विजोत्तम।।३।। प्रवर्तमान दशा से रुद्रशूल की दशा अन्तर में निश्चय ही पिता की मृत्यु होती है।।३।। लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि नवराशिर्बली द्विज। निर्विशंकं भवेत्तस्य शम्भुना कथितं पुरा।।४।।
अथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः ३०९ लग्न और सप्तम में जो बली राशि हो उससे नवम राशि वह पितृकारक होती है॥४॥ मातापित्रोः कारकाभ्यां चिन्तयेत्पूर्ववद्द्विज। तदायुर्निधनं चापि दीर्घादीनां प्रभेदतः॥५॥ एवं माता-पिता के कारकों से पूर्ववत् उनकी आयु का विचार करना चाहिए॥५॥ भानुभार्गवयोर्मध्ये सद्वीर्याधिक्यतो द्विज। ग्रहादित्यादिरीत्या च सखेटः पितृकारकः॥६॥ सूर्य और शुक्र में जो बली हो वह सूर्यादि ग्रहों में पितृकारक होता है॥६॥ चन्द्रमङ्गलयोर्मध्ये तथैव रविशुक्रयोः। बलेन रहितः सोऽपि पापग्रहनिरीक्षितः॥७॥ चन्द्र- भौम में जो बलवान् हो वह मातृकारक होता है। इन चारों ग्रहों में निर्बल भी कारक होता है, किन्तु वह निर्बल पापग्रह से देखा जाता हो तो॥७॥ पित्रादिकर्त्ता भजते यथाक्रम द्विजोत्तम। उभयोर्बलसाम्ये च उभौ पित्रादिकारकौ ॥८॥ दोनों के बल समान हों तो दोनों पित्रादि कारक होते हैं। यहाँ दो प्रकार से बली और निर्बल लेना चाहिए॥८॥ द्विविदं चिन्तयेत्तत्र प्राण्यप्राणिविभेदतः। पित्रादिकारकस्यैवं प्राणिफलं वदाम्यहम्॥९॥ इस प्रकार दो तरह के बली और निर्बल कारक होते हैं, जिसमें बलवान् पित्रादि कारक के फलं को कह रहा हूँ॥९॥ पित्रादिकारके विप्र शुभग्रहनिरीक्षिते। मातृकारकाश्रयीभूतराशिरैतत् त्रिकोणके॥१०॥ पित्रादि कारक शुभग्रह से देखा जाता हो एवं मातृकारक भी शुभ ग्रह से देखा जाता हो तो उनकी आश्रयीभूत राशि के त्रिकोण राशि की॥१०॥ दशायां निधनं वाच्यं मातापित्रोरथ त्रयम्। इति प्राणिकारकंस्य तवाग्रे कथितं फलम्॥११॥
३१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दशा में माता-पिता की मृत्यु कहना चाहिए। इस प्रकार बली कारक से फल को कहा।।११।। अप्राणिकारकस्यैवमष्टमेशो बलान्वितः। तस्याश्रयीभूतराशित्रिकोणे निधनं भवेत् ।।१२।। तथा निर्बल कारक से अष्टमेश बली हो तो उसकी आश्रयीभूत राशि के त्रिकोण राशि की दशा में मृत्यु होती है।।१२।। यदा रन्ध्रेश वीर्याढ्यं तच्छूले निधनं भवेत्। पितृमातृकारकयोः शूले निधनमेव च।।१३।। यदि अष्टमेश बली हो तो उसके शूल में अथवा पितृ-मातृकारक के शूल में मृत्यु होती है।।१३।। अथ बाल्ये पितृमरणयोगमाह— पित्रोः कारकयोर्विप्र प्राण्यप्राणिहीनोऽपि च। अर्कहीने पापयोगे शुभयोगविवर्जिते ।।१४।। पितृकारक और मातृकारक के बली और निर्बल होते हुए भी यदि कारक रवि को छोड़कर अन्य पापग्रहों के साथ हो तथा शुभग्रह से योग न होता हो तो।।१४।। द्वादशाब्दान्न्यूनवर्षे पित्रोर्मृत्युर्यथाकमम्। रविदृष्टावशुभयोगे नायं योगो द्विजोत्तम।।१५।। बारह वर्ष की अवस्था के अन्दर ही बालक के माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। सूर्य देखता हो और पापग्रह का योग होता हो तो यह योग नहीं होता है।।१५।। रव्यारूढविलग्नेऽपि पित्रोर्भावं विचारयेत्। तद्दशायां फलं वाच्यं पित्रोर्दुःखसुखादिकम् ।।१६।। रवि के आरूढ़ लग्न से भी पितृभाव का विचार कर उनकी दशा में माता-पिता के दुःख-सुख का विचार करना चाहिए।।१६।। अथ मातृनिर्याणम्— लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि बली राशिचतुर्थकः। तस्याः शूलदशायां च मातृर्मृत्युर्न संशयः ।।१७।। लग्न वा सप्तम में जो बली हो उससे चौथी राशि की शूलदशा में माता की मृत्यु होती है।।१७।।
अथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः ३११ अथ भ्रातृनिर्याणम्— लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि बली वीक्षेत्तृतीयकम्। तस्याः शूलदशायां च भ्रातृनिर्याणमेव च॥१९८॥ लग्न और सप्तम में जो बली हो, उससे तृतीय राशि की शूलदशा में भाई का निधन होता है।१९८॥ अथ ज्येष्ठभ्रातृनिर्याणम्— लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि लाभराशिर्बली द्विज। तस्याः शूलदशायां च निर्याणमग्रजस्य च॥१९९॥ लग्न वा सप्तम में जो बली हो, उससे ११वीं राशि की शूल दशा में ज्येष्ठ भाई की मृत्यु होती है॥१९९॥ भगिनी-पुत्रयोर्निर्याणम्— लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि राशिपञ्चमके बली। तस्याः शूलदशायां च निर्याणं भगिनीपुत्रयोः॥२००॥ लग्न और सप्तम में जो बली हो, उससे पाँचवीं राशि की शूलदशा में भगिनी और पुत्र का निर्याण होता है॥२००॥ अथ कलत्रनिर्याणमाह— कलत्रकारकः खेटस्तथा स्त्रीराशिचिन्तनम्। तत्त्रिकोणदशायां च कलत्रनिधनं भवेत्॥२१॥ स्त्रीकारक और सप्तम में जो बली हो, उससे त्रिकोण राशि की दशा में स्त्री का निधन होता है॥२१॥ अथान्येषां निर्याणमाह— तत्तत्कारकाश्च ये ये च त्रिकोणदशान्तरे। तेषां च मातुलादीनां निधनं भवति ध्रुवम्॥२२॥ इससे अतिरिक्त जिसके निधन का विचार करना हो उसके कारकों की आश्रयीभूत राशि की दशा अंतर में उन लोगों का (मामा आदि का) निधन कहना चाहिए।।२२।। अथ मृत्युसमये कष्टादिज्ञानमाह— लग्नाद्वा कारकाच्चापि तृतीये पापखेचरे। युते दृष्टेऽथ वा विप्र दुष्टं मरणमुच्यते॥२३॥
३१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्न वा कारक से तीसरे स्थान में पापग्रह युत हों वा देखते हों तो जातक का दुर्मरण कष्ट से होता है।।२३।। तत्तत्कारकतदीशात्तृतीये पापयोगकृत्। तेषां तेषां प्रवक्तव्यं दुष्टं मरणमेव च।।२४।। जिन लोगों के कारक और भावेश से तीसरे भाव में पापग्रह का योग हो, उनका दुष्ट मरण कहना चाहिए।।२४।। तत्तद्भावात्कारकेशात्तृतीये शुभदृष्टियुक्। तेषां तेषां प्रवक्तव्यं मरणं शुभमेव च।।२५।। जिन-जिन भावों वा कारकेशों से तीसरे भाव में शुभग्रह का योग और दृष्टि हो तो उनका मरण सुख से होता है।।२५।। शुभाशुभद्वये योगे दृष्टौ वापि तृतीयेके। शुभाऽशुभात्मकं विप्र मरणं भवति ध्रुवम्।।२६।। यदि शुभ-पाप दोनों युत वा देखते हों तो सुख-दुःख दोनों मरण के समय होता है।।२६।। अथ मरणनिमित्तान्याह— तृतीये भानुना दृष्टे तथा युक्ते बलाढ्यके। राजहेतोश्च मरणं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२७।। तृतीय भाव बलवान् सूर्य से युत वा दृष्ट हो तो राजा के कारण मृत्यु होती है।।२७।। सहजे शशिना युक्ते दृष्टे वा यक्ष्मया मृतिः। तृतीये शनिराहुभ्यां दृष्टे वापि युतेन वा।।२८।। तीसरे भाव को चन्द्रमा देखता हो वा उसमें युत हो तो यक्ष्मारोग से मृत्यु होती है। तीसरा भाव शनि-राहु से युत वा दृष्ट हो तो।।२८।। विषार्त्तिमरणं वाच्यं जलाद्वा वह्निपीडनात्। गर्त्तादुच्चाच्च पतनं बन्धनाद्वा मृतिर्भवेत्।।२९।। विष से वा जल से अथवा अग्निपीड़ा से मृत्यु होती है। अथवा ऊँचाई से गिरने वा बंधन से मृत्यु होती है।।२९।। तृतीये चन्द्रमान्दी च षष्ठे वापि युते द्विज। कृमिकुष्ठादिना तस्य मरणं च विनिर्दिशेत्।।३०।।