भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

३०६ ·बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि बहुत से ग्रह ब्रह्मा के लक्षण के हों तो वही ब्रह्मग्रह होता है, जिसका।।८।। सन्देहे निर्णयं चात्र तवाग्रे कथयामि च। द्व्यादिकः ग्रहाणां च योगो ब्रह्मेति लक्षितः।।९।। योगः स्वजातियो ग्राह्यः कारकं याति यो ग्रहः। बहूनामधिको भामः सोऽपि ब्रह्मा ग्रहोच्यते।।१०।। अधिक अंश होता है वही ब्रह्मा होता है।।१०।। राहुर्ब्रह्मत्वयोगेन अधिकारी यदा भवेत्। विपरीतं विजानीयात्सर्वेषु न्यूनभागकम्।।११।। यदि राहु ब्रह्मयोग का अधिकारी हो तो वहाँ विपरीत समझना चाहिए अर्थात् न्यूनांश वाला ही ब्रह्मा होता है।।११।। ईत्येकपापे पूर्वोक्तं ब्रह्मणा ग्रहकारकात्। रन्ध्राधीशोऽष्टमस्थो वा जात्यप्राणैक्यवाक्यतः।।१२।। अथवा आत्मकारक से अष्टमस्थ ग्रह वा अष्टमेश ब्रह्मा होता है।।१२।। द्वौ ब्रह्मा विपरीतार्थे ह्यथवा बहुब्रह्मणा। सामान्यभागान्तरे हि कतमो ग्राह्यमाणकः।।१३।। यदि पूर्वोक्त लक्षण से युक्त दो ब्रह्मा हों और अंशों में साधारण न्यूनाधिकता हो तो कौन-सा ग्रह ब्रह्मा होगा।।१३।। सर्वे भागसमानास्तु अग्रहात्सग्रहो बली। इति न्यायेन विज्ञेयं बलवान् ब्रह्मणोच्यते।।१४।। ब्रह्मत्वेन प्रधानेन ब्रह्मकार्यं करोत्यपि। स च ब्रह्मग्रहो ग्राह्यः पुरा शम्भुप्रचोदितः।।१५।। अथवा सभी के अंश समान हों तो जो ग्रह युक्त हो वही बली होता है, इत्यादि रीति से जो बलवान् हो वही ब्रह्मा होता है।।१४-१५।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्ममाहेश्वरस्य च। विशेषेण फलं सम्यगतवाग्रे द्विजनन्दन।।१६।। हे द्विजनंदन ! अब मै विशेष रूप से ब्रह्म और माहेश्वर ग्रहों के फल को तुमसे कह रहा हूँ।।१६।।