बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ मारकप्रकरणम् ३०५ माहेश्वरग्रहस्यापि ब्रह्मसाहित्यकेन च। ततो ब्रह्मग्रहं वक्ष्ये विशेषेण फलाय वै॥१॥ माहेश्वर ग्रह के अनुसार ही ब्रह्मग्रह की भी परिचर्या होने के कारण ब्रह्मग्रह का विचार कह रहा हूँ॥१॥ लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि रिपुरन्ध्रव्ययाधिपाः। एतेषु बलवान्विप्र मेषादिविषमस्थिते॥२॥ लग्न वा उससे सप्तम इन दोनों में जो बलवान् हो, उससे ६।८।१२ भाव के स्वामियों में जो बलवान् हो, वह मेषादि विषम राशियों में हो॥२॥ लग्नसप्तमयोर्मध्ये राशेश्च बलवान्भवेत्। उच्चैरपृष्ठभागाद्यः संयोगो विद्यमानतः॥३॥ और लग्न वा सप्तम के पृष्ठभाग में उक्त तीनों गुणों से युक्त हो तो वह ब्रह्मग्रह होता है॥३॥ एतद्गुणत्रयाद्युक्तः सोऽपि ब्रह्माग्रहः स्मृतः। लग्नस्य पृष्ठभागं च द्यूनाल्लग्नावधिर्द्विज॥४॥ सप्तम से लग्न पर्यन्त ६ भाव लग्न का पृष्ठ भागं॥४॥ सप्तमस्य पृष्ठभागं षट्कलग्नादिकं द्विज। बलवान्विषमस्थोऽपि ब्रह्माखेटः स उच्यते॥५॥ और लग्न से सप्तम भाव के अन्दर सप्तम का पृष्ठभाग होता है॥५॥ ब्रह्मणालक्षणाक्रान्ते बलवान्वापि पातयोः। शनिराहुर्थो केतुर्यदि षष्ठो ग्रहो द्विज॥६॥ यदि ब्रह्मग्रह के लक्षण से युक्त शनि, राहु वा केतु हो तो इनमें जो बलवान् हो इनसे षष्ठेश ब्रह्मा होता है॥६॥ रव्यादिगणनायां च शन्यादौ तृतीयो ग्रहः। स्थानात्षष्ठराशिगे च षष्ठराश्यधिपोऽथवा॥७॥ सूर्यादि गणना से शनि आदि शनि से तीसरा ग्रह स्थान से षठा अथवा षष्ठेश॥७॥ सोऽपि ब्रह्माग्रहो ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। बहुना ब्रह्मणाक्रान्ते को ग्रहो ग्राह्यमाणकः॥८॥