बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् स्वल्पायुः प्रथमे शूले मध्यमायुर्द्वितीयके । दीर्घायुश्च तृतीयान्ते शूले च निधनं भवेत् ।।९२।। उसमे अल्पायु हो तो प्रथम शूल में, मध्यायु हो तो द्वितीय शूल में और दीर्घायु हो तो तृतीय शूलांत तक आयु होती है ।।९२।। ततो फलविशेषार्थं माहेश्वरग्रहं द्विज। लक्षयन्ति तवाग्रे च तस्मादायुर्विनिश्चितम् ।।९३ ।। ग्रह का निर्णय कह रहा हूँ।।९३।। चिन्तयेत्कारके लग्ने ह्यष्टमेशो महेश्वरः। अथैवान्यप्रकारेण माहेश्वरं वदाम्यहम् ।।९४।। आत्मकारक से अष्टमेश महेश्वर ग्रह होता है। अन्य प्रकार से माहेश्वर ग्रह को कह रहा हूँ।।९४।। कारके तुङ्गराशिस्थे स ग्रहो बलवत्तरः। रिःफरन्ध्राधिपोर्मध्ये सोऽपि माहेश्वरो ग्रहः ।।९५।। कारकाच्च ग्रहाभावे नाथो माहेश्वरो भवेत् । रिष्फरन्ध्राधिपौ विप्र बले सामान्यतां यदि ।।९६ ।। आत्मकारक अपनी उच्चराशि में हो तो आत्मकारक से १२, ६ वें भाव के स्वामियों में जो बली हों वही महेश्वरग्रह होता है।।९५-९६।। द्वयं माहेश्वरं यातो यथा रुद्रग्रहौ द्वयम्। ताभ्यां च निर्णयार्थाय प्रकारान्यं वदाम्यहम् ।।९७ ।। यदि दोनों में बल की समानता हो तो दोनों माहेश्वर होते हैं।।९७।। स्वकारकस्य योगश्चेद्राहुकेतुरवीन्विना। माहेश्वरो भवत्येव विकल्पेन द्विजोत्तम ।।९८।। यदि आत्मकारक के साथ राहु-केतु हों।।९८।। कारकस्याष्टमे पापग्रहो माहेश्वरो भवेत् । रविचन्द्रौ च चान्द्रिश्च गुरुः शुक्रः शनिस्तमः ।।९९।। अथवा आत्मकारक से आठवें हों तो कारक से षष्ठेश रवि, चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।।९९।। शिखिना गणनायां च यः षष्ठः कारकग्रहात्। सोऽपि माहेश्वरो ज्ञेयो नवभागसमुच्चयात् ।।१००।। तथा केतु में से जो छठे हो वह माहेश्वर होता है।।१००।।