बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः ३०९ लग्न और सप्तम में जो बली राशि हो उससे नवम राशि वह पितृकारक होती है॥४॥ मातापित्रोः कारकाभ्यां चिन्तयेत्पूर्ववद्द्विज। तदायुर्निधनं चापि दीर्घादीनां प्रभेदतः॥५॥ एवं माता-पिता के कारकों से पूर्ववत् उनकी आयु का विचार करना चाहिए॥५॥ भानुभार्गवयोर्मध्ये सद्वीर्याधिक्यतो द्विज। ग्रहादित्यादिरीत्या च सखेटः पितृकारकः॥६॥ सूर्य और शुक्र में जो बली हो वह सूर्यादि ग्रहों में पितृकारक होता है॥६॥ चन्द्रमङ्गलयोर्मध्ये तथैव रविशुक्रयोः। बलेन रहितः सोऽपि पापग्रहनिरीक्षितः॥७॥ चन्द्र- भौम में जो बलवान् हो वह मातृकारक होता है। इन चारों ग्रहों में निर्बल भी कारक होता है, किन्तु वह निर्बल पापग्रह से देखा जाता हो तो॥७॥ पित्रादिकर्त्ता भजते यथाक्रम द्विजोत्तम। उभयोर्बलसाम्ये च उभौ पित्रादिकारकौ ॥८॥ दोनों के बल समान हों तो दोनों पित्रादि कारक होते हैं। यहाँ दो प्रकार से बली और निर्बल लेना चाहिए॥८॥ द्विविदं चिन्तयेत्तत्र प्राण्यप्राणिविभेदतः। पित्रादिकारकस्यैवं प्राणिफलं वदाम्यहम्॥९॥ इस प्रकार दो तरह के बली और निर्बल कारक होते हैं, जिसमें बलवान् पित्रादि कारक के फलं को कह रहा हूँ॥९॥ पित्रादिकारके विप्र शुभग्रहनिरीक्षिते। मातृकारकाश्रयीभूतराशिरैतत् त्रिकोणके॥१०॥ पित्रादि कारक शुभग्रह से देखा जाता हो एवं मातृकारक भी शुभ ग्रह से देखा जाता हो तो उनकी आश्रयीभूत राशि के त्रिकोण राशि की॥१०॥ दशायां निधनं वाच्यं मातापित्रोरथ त्रयम्। इति प्राणिकारकंस्य तवाग्रे कथितं फलम्॥११॥