बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दशा में माता-पिता की मृत्यु कहना चाहिए। इस प्रकार बली कारक से फल को कहा।।११।। अप्राणिकारकस्यैवमष्टमेशो बलान्वितः। तस्याश्रयीभूतराशित्रिकोणे निधनं भवेत् ।।१२।। तथा निर्बल कारक से अष्टमेश बली हो तो उसकी आश्रयीभूत राशि के त्रिकोण राशि की दशा में मृत्यु होती है।।१२।। यदा रन्ध्रेश वीर्याढ्यं तच्छूले निधनं भवेत्। पितृमातृकारकयोः शूले निधनमेव च।।१३।। यदि अष्टमेश बली हो तो उसके शूल में अथवा पितृ-मातृकारक के शूल में मृत्यु होती है।।१३।। अथ बाल्ये पितृमरणयोगमाह— पित्रोः कारकयोर्विप्र प्राण्यप्राणिहीनोऽपि च। अर्कहीने पापयोगे शुभयोगविवर्जिते ।।१४।। पितृकारक और मातृकारक के बली और निर्बल होते हुए भी यदि कारक रवि को छोड़कर अन्य पापग्रहों के साथ हो तथा शुभग्रह से योग न होता हो तो।।१४।। द्वादशाब्दान्न्यूनवर्षे पित्रोर्मृत्युर्यथाकमम्। रविदृष्टावशुभयोगे नायं योगो द्विजोत्तम।।१५।। बारह वर्ष की अवस्था के अन्दर ही बालक के माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। सूर्य देखता हो और पापग्रह का योग होता हो तो यह योग नहीं होता है।।१५।। रव्यारूढविलग्नेऽपि पित्रोर्भावं विचारयेत्। तद्दशायां फलं वाच्यं पित्रोर्दुःखसुखादिकम् ।।१६।। रवि के आरूढ़ लग्न से भी पितृभाव का विचार कर उनकी दशा में माता-पिता के दुःख-सुख का विचार करना चाहिए।।१६।। अथ मातृनिर्याणम्— लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि बली राशिचतुर्थकः। तस्याः शूलदशायां च मातृर्मृत्युर्न संशयः ।।१७।। लग्न वा सप्तम में जो बली हो उससे चौथी राशि की शूलदशा में माता की मृत्यु होती है।।१७।।