बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मध्यायुषि मृतिः षष्ठदशायामष्टमस्य वा। षष्ठात् त्रिकोणस्य पुनर्दीर्घाल्पविषये भवेत्।।२४।। यदि मध्यायु हो तो छठी वा आठवीं दशा में मृत्यु होती है। दीर्घायु और अल्पायु हो तो छठे से त्रिकोण की दशा में मृत्यु होती है।।२४।। षष्ठे बलयुते तस्य त्रिकोणे मृतिमादिशेत्। षष्ठेशश्चेद्बलाढ्यः स्यात् तत्रिकोणे मृतिं वदेत्।।२५।। यदि छठा स्थान बली हो तो उसके त्रिकोण में मृत्यु होती है। यदि षष्ठेश बलवान् हो तो उसके त्रिकोण में मृत्यु होती है।।२५।। व्यवस्थेयं समस्तापि कारकादिदशास्वपि। बलिनः शुक्रशशिनोग्राह्यं षष्ठाष्टमादिकम्।।२६।। यह व्यवस्था सभी कारक दशाओं में होती है। शुक्र-चन्द्रमा बली हों तों छठे, आठवें को लेना चाहिए।।२६।। इति रुद्रमाहेश्वरब्रह्मग्रहादि मारकाध्यायः। अथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः अधुना सम्प्रवक्ष्यामि पित्रादेश्च द्विजोत्तम। योगं निर्याणकाख्यातं यथा शम्भुप्रणोदितम्।।१।। हे द्विजोत्तम ! अब मै पित्रादिकों के मरण समय को कह रहा हूँ, जैसा कि शंकरजी ने कहा है।।१।। लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान्द्विज। तस्य राशेः समारभ्य क्रमेण पूर्ववद्द्विज।।२।। लग्न और सप्तम में जो राशि बलवान् हो उस राशि के अनुसार ।।२।। प्रवर्त्तकदशारीत्या रुद्रशूलदशान्तरे। भविष्यति पितुर्मृत्युर्निर्वशङ्कं द्विजोत्तम।।३।। प्रवर्तमान दशा से रुद्रशूल की दशा अन्तर में निश्चय ही पिता की मृत्यु होती है।।३।। लग्नाद्वा सप्तमाद्वापि नवराशिर्बली द्विज। निर्विशंकं भवेत्तस्य शम्भुना कथितं पुरा।।४।।