भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ मारक प्रकरणम्। २९५ शुभग्रह का योग न हो, पापयोग भी न हो, वा पाप योग हो अथवा भौम, शनि, चन्द्रमा के साथ और भी शुभग्रह की दृष्टि हो तो रुद्रा- श्रित राशि की अग्रिम राशि की दशा में मृत्यु होती है।।२२।। शुभदृष्टे वा शूलान्तात्परञ्चायुर्भवेदपि। योगद्वयपरत्वेन योजनीयं न संशयः।।२३।। शुभग्रह के योग के अभाव में पापग्रह का योग होते हुए दोनों योगों का एक के बाद दूसरे का विचार करना चाहिए।।२३।। एतद्योगद्वयं किञ्चिन्न्यूनतायामपि द्विज। नेदं फलं प्रवक्तव्यं मैत्रेय भाषितं पुरा।।२४।। इन दोनों के योगों के न्यून होने से पूर्व का फल नहीं होता है।।२४।। शुभदृष्टिभवे चैव योगे च परपूर्ववत्। शुभदृष्टावसन्त्यां च पापयोगाद्यभावतः।।२५।। शुभ दृष्टि होते हुए अथवा शुभ दृष्टि के अभाव में पापयोगादि के अभाव में शुभ दृष्टि के होते हुए एक योग होता है।।२५।। कृत एको हि योगश्च पूर्वयोगजमेव च। अशुभयोगे शुभदृष्टौ योगोऽयमपरो द्विज।।२६।। पापग्रह के योग में शुभ दृष्टि के होते हुए दूसरा योग होता है।।२६।। पापयोगैरभावे च शुभदृष्टौ च संयुते। १कैमुतिकाख्यन्यायेन सिद्धो योगस्तृतीयकः।।२७।। पाप योग के अभाव में शुभ दृष्टि होते हुए कैमुतिक न्याय से तीसरा योग भी होता है।।२७।। पुरा प्रोवाच यच्छम्भुस्तवाग्रे कथयाम्यहम्। द्वितीययोजनायां तु शुभदृष्टिसमन्विते।।२८।। पूर्व में शम्भु ने जो कहा था उसे मैंने तुमसे कहा। दूसरे योग में पापयोग शुभदृष्टि में।।२८।। पापयोगस्य चाभावे योगः प्रथम उच्यते। पापयोगे महाप्राज्ञ शुभदृष्टे प्रभावके।।२९।। १. कैमुतिकन्याय अर्थापत्ति को कहते हैं, जैसे चूहा लकड़ी को खा गया तो इससे मृदुपदार्थ मिठाई आदि को भी खा सकता है।