भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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२९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पापग्रह के योग के अभाव में प्रथम योग और पापग्रह योग में शुभदृष्टि में दूसरा ॥२९॥ द्वितीययोगपक्षेऽहं पूर्वस्मिन् द्विजसत्तम। पापयोगस्य चाभावे पापदृष्टिविवर्जितः॥३०॥ अथवा पापयोग के अभाव में पापदृष्टि के न होने में॥३०॥ कैमुतिकाख्यन्यायेन तृतीयो योग उच्यते। अथैवं प्राणिरुद्रस्य ह्युक्ता पक्षान्तरे कथा॥३१॥ कैमुतिकन्याय से यह तीसरा योग हुआ। यह प्राणीरुद्र के पक्षान्तर से स्वरूप कहा है॥३१॥ तत्रैव प्रथमे योगे शुभदृष्टिविवर्जिते। शुभयोगादियोगश्च द्वितीयोक्तेन योगकृत्॥३२॥ प्रथम योग में शुभ दृष्टि से रहित होने में शुभादि योग होने से॥३२॥ तृतीयेन द्वयस्यापि योगभङ्गं करोत्यपि। अधुनोक्तत्रयाभावे मन्दादिदृष्टिमात्रतः॥३३॥ तीसरे से दूसरे के साथ योग होने से तथा उक्त तीनों योगों के अभाव में शन्यादि दृष्टि के भेद से निर्विशंक कह रहा हूँ॥३३॥ एवं स्थिते सुयोगश्च निःशङ्कं प्रतिपाद्यते। अशुभैः खेचरैर्दृष्टे पापयोग इति स्थितिः॥३४॥ अशुभ ग्रह की दृष्टि और पापयोग॥३४॥ शुभयोगविहीने च मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। तदायुः परतो विप्र समानादिति योजयेत्॥३५॥ शुभ योग से हीन शनि, भौम, चन्द्र से दृष्ट हो तो रुद्रशूल के बाद तक आयु होती है॥३५॥ प्रथमे द्वितीये सन्तः पापयोगैरभावतः। योगो भङ्गमपेक्षा च तृतीयोक्तमिदं वदेत्॥३६॥ प्रथम, द्वितीय योग में पापयोग के अभाव में योग भंग होने से तीसरे योग की उत्पत्ति होती है॥३६॥