बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रत्येकं शुभराशिस्थो उच्चस्थो वा बुधः शुभः। गुरुशुक्रौ च सौम्यस्थौ ततोऽन्ये च शुभाः स्मृताः।।६०।। प्रत्येक शुभराशि में वा अपनी उच्चराशि में बुध शुभद होता है एवं गुरु-शुक्र शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।६०।। पूर्वस्मिन् पापयोगेन योगभङ्गद्वये द्विज। निरूपितं तवाग्रे च निर्विशङ्कं न संशयः।।६१।। एवं पूर्वोक्त पापग्रह के योग से दोनों पूर्वोक्त भंग योग कहा गया है।।६१।। योगद्वयेऽपि भङ्गार्थे पापदृष्टौ विशेषकम्। न दर्शयति कदापि स्यात् तवाग्रे कथयामि वै।।६२।। किन्तु दोनों योगों में विशेषतः पापदृष्टि अपेक्षित है।।६२।। शुभग्रहाणामभावे मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। पापयोगे शुभैर्दृष्टे परतश्चायुषि द्विज।।६३।। प्राणिरुद्रेऽप्यगौणेन शुभयोगविवर्जिते। पापयोगेऽथवा दृष्टे तथा शुभनिरीक्षिते।।६४।। शुभग्रहों की दृष्टि न हो, शनि, भौम, चन्द्रमा देखते हों अथवा पापग्रह का योग वा दृष्टि हो, शुभग्रह देखता हो तो पूर्ववत् तारतम्य से फल का विचार करना चाहिए।।६४।। व्यापारतानुविज्ञेया पूर्ववद्द्विजसत्तम। अत्रोपपदपापाच्च राहोरप्युपलक्षणम्।।६५।। इसी प्रकार उपपद की चर्चा से राहु की चर्चा से उपलक्षण मात्र है।।६५।। एवं सूर्यातिरिक्तोऽपि पापयोगस्तथैव च। तस्यैवेहानुवादाच्च राहोश्चोपबृंहणात्।।६६।। सूर्य के अतिरिक्त पापग्रह के योग से भी योग होता है।।६६।। परिग्रहदर्शनाच्च परतो रुद्रमाश्रयात्। शुभस्थाने आयुरन्तः शूलत्रयमलङ्घनात्।।६७।। इन परिग्रहों के रहते हुए रुद्रग्रह के आश्रय से शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।६७।।