भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ मारकप्रकरणम्। ३०१ न तु शूलदशायां च आयुरन्तं द्विजोत्तम। एवं शूले चेत्तदन्तशूलरीत्येति बाधके॥६८॥ किन्तु शूल में मृत्यु न होकर उसके अन्त में मृत्यु होती है॥६८॥ पूर्वोक्तपापयोगेन शुभयोगेन दृष्टितः। कृतयोगद्वयस्यापि भङ्गार्थे च वदाम्यहम्॥६९॥ पूर्वोक्त दोनों योगों के भंग के लिए कह रहा हूँ। शुभग्रह का योग होने से पापग्रह का योग दुर्बल हो जाता है॥६९॥ शुभयोगेन वै विप्र पापयोगोऽतिदुर्बलः। शुभदृष्टिकृतो योगः पापदृष्टे कथं क्षमः॥७०॥ एवं शुभ दृष्टि होते हुए पापग्रह की दृष्टि कैसे समर्थ हो सकती है॥७०॥ न भञ्जनसमर्थश्च कोटियत्ने कृते द्विज। शुभकृद्योगभङ्गार्थे पापयोगमपेक्षितम्॥७१॥ शुभग्रहजनित योग के भंग के लिए पापग्रहजनित योग होना आवश्यक है ॥५६-७१॥ शुभयोगे दृष्टिकृते पापयोगोऽपि भञ्जकः। शुभदृष्टिकृते योगः पापयोगो विनश्यति॥७२॥ शुभग्रह का योग वा दृष्टि होने से पापयोग का भंग हो जाता है॥७२॥ यदायुर्दायमध्यस्थं वेदितव्यं द्विजोत्तम। पापमात्रस्य शूलत्वे प्रथमर्क्षे मृतिं वदेत्॥७३॥ केवल पापयोग की दृष्टि मात्र ही हो तो प्रथम शूल में ही मृत्यु होती है॥७३॥ द्वौ रुद्रौ पूर्ववक्ष्येऽहं यदि चैकत्र संस्थितौ। मित्रंमध्यमशूलर्क्षे शुभमात्रेऽन्तिमे मृतिः॥७४॥ पूर्वोक्त दोनों रुद्र यदि एक ही स्थान में हों तो मध्यम शूल में मृत्यु होती है॥७४॥ द्वयोः पापे च प्रथमे शूले मृत्युर्भवत्यपि। यद्येकरुद्रः पापी च द्वितीयः शुभखेचरः॥७५॥