बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्न वा कारक से तीसरे स्थान में पापग्रह युत हों वा देखते हों तो जातक का दुर्मरण कष्ट से होता है।।२३।। तत्तत्कारकतदीशात्तृतीये पापयोगकृत्। तेषां तेषां प्रवक्तव्यं दुष्टं मरणमेव च।।२४।। जिन लोगों के कारक और भावेश से तीसरे भाव में पापग्रह का योग हो, उनका दुष्ट मरण कहना चाहिए।।२४।। तत्तद्भावात्कारकेशात्तृतीये शुभदृष्टियुक्। तेषां तेषां प्रवक्तव्यं मरणं शुभमेव च।।२५।। जिन-जिन भावों वा कारकेशों से तीसरे भाव में शुभग्रह का योग और दृष्टि हो तो उनका मरण सुख से होता है।।२५।। शुभाशुभद्वये योगे दृष्टौ वापि तृतीयेके। शुभाऽशुभात्मकं विप्र मरणं भवति ध्रुवम्।।२६।। यदि शुभ-पाप दोनों युत वा देखते हों तो सुख-दुःख दोनों मरण के समय होता है।।२६।। अथ मरणनिमित्तान्याह— तृतीये भानुना दृष्टे तथा युक्ते बलाढ्यके। राजहेतोश्च मरणं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२७।। तृतीय भाव बलवान् सूर्य से युत वा दृष्ट हो तो राजा के कारण मृत्यु होती है।।२७।। सहजे शशिना युक्ते दृष्टे वा यक्ष्मया मृतिः। तृतीये शनिराहुभ्यां दृष्टे वापि युतेन वा।।२८।। तीसरे भाव को चन्द्रमा देखता हो वा उसमें युत हो तो यक्ष्मारोग से मृत्यु होती है। तीसरा भाव शनि-राहु से युत वा दृष्ट हो तो।।२८।। विषार्त्तिमरणं वाच्यं जलाद्वा वह्निपीडनात्। गर्त्तादुच्चाच्च पतनं बन्धनाद्वा मृतिर्भवेत्।।२९।। विष से वा जल से अथवा अग्निपीड़ा से मृत्यु होती है। अथवा ऊँचाई से गिरने वा बंधन से मृत्यु होती है।।२९।। तृतीये चन्द्रमान्दी च षष्ठे वापि युते द्विज। कृमिकुष्ठादिना तस्य मरणं च विनिर्दिशेत्।।३०।।