बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पित्रादिनिर्याणाध्यायः ३१३ तीसरे भाव में वा छठे भाव में चन्द्रमा तथा गुलिक हों वा देखते हों तो कृमि वा कुष्ठ रोग से मृत्यु होती है।।३०।। तृतीये गुरुणा दृष्टे युक्ते शोकादिना मृतिः। तृतीये भृगुयुग्दृष्टे मेहरोगेण वै मृतिः।।३१।। तीसरे भाव को गुरु देखता हो वा उसमें युत हो तो शोफरोग से मृत्यु होती है।।३१।। बहुयुक्ते तृतीये च बहुरोगयुता मृतिः। तृतीये केतु सत्खेटैर्योगे दृष्टेऽथवा द्विज।।३२।। यदि बहुत से ग्रह तीसरे भाव में हों तो बहुत रोगों से मृत्यु होती है। तीसरे भाव में शुभ ग्रह हों वा देखते हों ।।३२।। तत्रैव चन्द्रयोगे च तत्तद्रोगेण वै मृतिः। कुजेन व्रणशस्त्राग्निदाहाद्यैर्मृत्युमादिशेत्।।३३।। और चंद्रमा का भी योग हो तो उनके रोग से मृत्यु होती है। तीसरे भाव में मंगल हो, या उसे देखता हो तो व्रण-शस्त्र-अग्नि से जलने आदि से मृत्यु होती है।।३३।। तृतीये सौम्यसंयुक्ते दृष्टे वापि तथा द्विज। ज्वरेण तस्य मृत्युः स्यान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।३४।। तीसरे भाव में बुध हो अथवा उसे देखता हो तो ज्वर से मृत्यु होती है।।३४।। अथ मरणप्रदेशज्ञानमाह— तृतीये शुभयोगेन शुभदेशे मृतिर्भवेत्। पापेन कीकटे देशे मिश्रे मिश्रस्थले मृतिः।।३५।। तीसरे भाव में शुभग्रह का योग हो तो शुभ प्रदेश में मृत्यु होती है। पापग्रह का योग हो तो दुष्ट स्थान में और शुभ-पाप दोनों हों तो मिश्र स्थान में मृत्यु होती है।।३५।। अथ ज्ञानपूर्वकं मृत्युमाह— तृतीये गुरुशुक्राभ्यां योगे ज्ञानेन वै मृतिः। गुरुशुक्रातिरिक्तानां योगे शिथिलता मृतौ।।३६।। तीसरे भाव में गुरु-शुक्र हों तो ज्ञानपूर्वक मृत्यु होती है। इन दोनों से भिन्न ग्रह हों तो मृत्यु समय में अज्ञानता होती है।।३६।। इति निधनप्रकरणम्।