बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मारकभेदाध्यायः त्रिविधाश्चायुषो योगाः स्वल्पायुर्मध्यमोत्तमाः। द्वात्रिंशात्पूर्वमल्पायुर्मध्यमायुस्ततो भवेत्। चतुःषष्ट्याः पुरस्तात्तु ततो दीर्घमुदाहृतम् ।।१।। तीन प्रकार के आयु के योग कहे गये हैं, जो कि अल्पायु, मध्यमायु और उत्तमायु वा दीर्घायु के नाम से प्रसिद्ध हैं। ३२ वर्ष से पूर्व अल्पायु होती है। इसके बाद ६४ वर्ष की अवस्था तक मध्यमायु होती है। इसके बाद दीर्घायु होती है।।१।। उत्तमायुः शतादूर्ध्वं ज्ञातव्यं मुनिसत्तम। चतुर्विंशतिवर्षान्तमायुर्ज्ञातुं न शक्यते।।२।। इसके बाद १०० वर्ष तक दीर्घायु और इसके ऊपर उत्तमायु होती है। जन्म से २४ वर्ष पर्यन्त आयु का ज्ञान नहीं होता है अर्थात् उक्त समय तक आयु के ऊपर निर्भर नहीं रहना चाहिए।।२।। जपहोमचिकित्साद्यैर्बालरक्षां तु कारयेत्। पितृदोषैर्मृताः केचित्केचिन्मातृग्रहैरपि ।।३।। तब तक यानि २४ वर्ष की अवस्था पर्यन्त जप, होम, चिकित्सा आदि से बालकों की रक्षा करनी चाहिए। उक्त वर्ष के अंदर कोई पिता के ग्रहों से, कोई माता के ग्रहों से।।३।। अपरेऽरिष्टयोगाच्च त्रिविधा बालमृत्युवः। अल्पायुर्योगजातस्य विपत्तारां मृतिं वदेत् ।।४।। और कोई अरिष्ट योग से मर जाते हैं। इस तरह तीन प्रकार से बालकों की मृत्यु होती है। जिनकी अल्पायु होती है उनकी विपत्तारा की दशा में ।।४।। जातस्य मध्यमायुष्ये प्रत्यरौ च मृतिर्भवेत्। दीर्घायुर्योगजातानां वधभे तु मृतिर्भवेत् ।।५।। मध्यमायु योग वाले की प्रत्यरि तारा की दशा में और दीर्घायु योग वाले की वध तारा की दशा में मृत्यु होती है।।५।। अष्टमर्क्षं तृतीयं च लग्नादायुरुदाहृतम्। द्वितीयं सप्तमस्थानं मारकस्थानमुच्यते ।।६।।