भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 800 में से

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पृष्ठ 32

३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जो ग्रह जिस ग्रह से १०।११।४।३।२।१२ वें स्थान में होता है वह ग्रह उस ग्रह का तात्कालिक मित्र होता है, शेष स्थानों में शत्रु होता है ।।४८।। अथ पञ्चधा मैत्रीमाह— तात्कालिके निसर्गे च मित्रत्वे त्वधिमित्रकम्। द्वयोर्मित्रसमत्वे च मित्रं शत्रुः शत्रुसमत्वके ।।४९।। जो ग्रह जिस ग्रह का तात्कालिक और निसर्ग में मित्र होता है वह उस ग्रह का अधिमित्र होता है। तत्काल में मित्र और निसर्ग में सम हो तो वह मित्र होता है। तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक सम हो तो शत्रु होता है।।४९।। समौ तु शत्रुमित्रत्वे शत्रुशत्रौ त्वधिशत्रुकम्। एवं पञ्चप्रकाराः स्युः ग्रहाणां मित्रता बुधैः ।।५०।। नैसर्गिक मित्र और तात्कालिक शत्रु या नैसर्गिक शत्रु और तात्कालिक मित्र हो तो सम होता है। तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक सम हो तो शत्रु होता है और तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक शत्रु हो तो अधिशत्रु होता है। इस प्रकार ग्रहों की पाँच प्रकार की मैत्री होती है ।।५०।। उदाहरण नैसर्गिकमैत्रीचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
चं. <br> मं. <br> बृ.सू. <br> बु.सू. <br> चं. <br> बृ.सू. <br> शु.सू. <br> चं. <br> मं.बु. <br> श.बु. <br> शु.मित्राणि
बु.मं. <br> बृ. <br> शु. <br> श.शु. <br> श.चं. <br> बृ. <br> श.श.मं. <br> बृ.बृ.समाः
शु. <br> श.बु.चं.बु. <br> शु.सू. <br> चं.सू. <br> चं. <br> मं.शत्रवः

जन्माङ्गम्

  • लग्न (१०): रिक्त
  • द्वितीय भाव (११): मं.
  • तृतीय भाव (१२): रिक्त
  • चतुर्थ भाव (१): रिक्त
  • पञ्चम भाव (२): के.
  • षष्ठ भाव (३): शु., चं.
  • सप्तम भाव (४): सू.
  • अष्टम भाव (५): बु., बृ.
  • नवम भाव (६): रिक्त
  • दशम भाव (७): रिक्त
  • एकादश भाव (८): श., रा.
  • द्वादश भाव (९): रिक्त
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