भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३५ सर्वक्षयं च मरणं मन्देनैव निरीक्षयेत्। रविः पिता शशी माता भ्रातां भौमो बुधः सुहृत् ॥५॥ सर्वनाश और मृत्यु का विचार शनि से करना चाहिए। रवि पिता कारक बुध है।।५।। मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानंपुण्ये स्त्रियः सितः। एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः॥६॥ ज्ञान, गुण का कारक गुरु और स्त्री (पत्नी) का कारक शुक्र है। इनकी राशि में जब शनि जाता है तो इन लोगों को कष्ट होता है।।६।। तत्तद्भावफलेन च गुणितं योगैक्यपिण्डं फलम्। विंशत्या सह सप्तभिश्च विहृतं तच्छेषताराशनौ ॥७॥ जिन भावों का विचार करना हो उन २ भावों के फल (अष्टक वर्ग की रेखा) को उस ग्रह के योगपिंड को गुणाकर गुणनफल में २७ का भाग देने से जो शेष बचे तत्तुल्य अश्विनी से गिनने से जो नक्षत्र आवे उस पर जब शनि आता है।।७।। तातः स्याज्जननी सहोदरजवो बन्धुःसुतः स्त्री स्वयम्। तत्तुल्यं विलयं प्रयाति विपुलं श्रीनाथहेतुश्च वा॥८॥ तब पिता, माता, भाई, बंधु, पुत्र, स्त्री आदि को कष्ट होता है अथवा लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।।८।। सूर्याष्टकवर्गफलम्- आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु। अर्कस्थितात्तु नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम्॥९॥ सूर्याष्टक वर्ग का न्यासं ग्रहं सहित करे। सूर्य से नवम स्थान पिता का होता है।।९।। तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्धयेद्योगपिण्डकम्। सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजः॥१०॥ उस राशि के फल को (रेखा को) योगपिंड से गुणाकर गुणनफल में २७ का भाग देने से जो शेष हो, तत्संख्या के तुल्य अश्विनी से गिनने से जो नक्षत्र हो उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है।।१०।। तस्मिन् काले पितृकष्टो भवतीति न संशयः। तत्त्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपि वा। मरणं तस्य जानीयाद्दशा छिद्रेषु कल्पयेत् ॥११॥