भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

३३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तो उस समय पिता को कष्ट होता है, इसमें संदेह नहीं। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण में (१०वें, ९वें नक्षत्र) जब शनि होता है तब पिता या पिता के तुल्य (चाचा आदि) का मरण होता है। उस समय की दशां को छिद्रदशा कहते हैं।।९१।। अथ पित्रोररिष्टकालमाह- अर्कभात्तु तुर्येगे राहौ मन्दे वा भूमिनन्दने। गुरुशुक्रेक्षणमृते पितृहा जायते नरः।।९२।। सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और गुरु-शुक्र से न देखा जाता हो तो पिता को अरिष्टकारक होता है।।९२।। लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि। पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते।।९३।। लग्न वा चन्द्रमा से नवम स्थान में जिस समय शनि हो और पापग्रह से युत तथा देखा जाता हो तो उस समय पिता का मरण कहे।।९३।। दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः। लग्नात्सुखेश्वरानिष्टदशायां च पितृक्षयः।।९४।। यदि अनुकूल दशा हो तो अरिष्ट नहीं होता है। लग्न से सुखेश (चतुर्थेश) की अनिष्ट दशा में भी पिता का नाश होता है।।९४।। पितृकर्मकर्त्ता योगः- पितृजन्माष्टमी जातस्तदीशे लग्नगेऽपि वा। तेनैव पितृकर्माणि कारयेन्नात्र संशयः।।९५।। पिता के जन्मलग्न से आठवीं राशि में जन्म हो और उस राशि के स्वामी लग्न में हों तो वह पिता के कर्म को करने वाला होता है।।९५।। अथ पितृसुखयोगः- सुखनाथदशायं तु बहुप्राप्तेश्च सम्भवः। सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः।।९६।। सुखेश की दशा में अधिक सुख पाने की संभावना होती है। सुखेश ११ वें भाव में हो अथवा चन्द्रमा से ११वें वा दशम भाव में हो तो जातक पिता के वश में रहने वाला होता है।।९६।। पितृगृहे समायुक्ते जातः पितृवशानुगः। पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः।।९७।।