बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३७ पिता के जन्मलग्न से तीसरी राशि में जन्म हो तो वह पिता के धन का आश्रित होता है॥१७॥ पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः। तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेन्नरः॥१८॥ पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में उत्पन्न हो तो जातक पिता के गुणों के सदृश गुण वाला होता है और दशम राशि का स्वामी लग्न में हो तो पिता से श्रेष्ठ होता है॥१८॥ अथ विशेषफलमाह- सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं मासे तद्दिवसेऽपि वा। विवाहव्यवहारादि मासेऽस्मिन्वर्जयेत्सदा ॥१९॥ सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि संबंधी मास और दिन में विवाह आदि शुभ कार्य, व्यवहार आदि न करे॥१९॥ कलहोत्पातदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च। संशोध्यपिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्धयेत् ॥२०॥ शून्य वाले मास में कलह, उत्पात आदि दुःख होते हैं। सूर्य के पिंड का शोधन कर अष्टम स्थान की फल रेखा से योगपिंड को गुणाकरं ॥२०॥ द्वादशहृतावशेषं मेषादिगणयेत्पुनः। तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्त्रिकोणगतेऽपि वा॥२१॥ उसमे १२ से भाग दे, शेष मेषादि से गिनने से जो राशि हो उस राशि के मास में अरिष्ट होता है अथवा उससे त्रिकोण राशि के मास में अरिष्ट होता है॥२१॥ इति सूर्याष्टकवर्गफलविचारः। अथ चन्द्राष्टकवर्गफलविचारः- चन्द्राच्चतुर्थगे मातुः प्रासादग्रामचिन्तनम्। चन्द्राष्टवर्गे यच्छून्यं तत्र राशिगते विधौ॥२२॥ चन्द्रमा से चौथे माता, गृह, ग्राम का विचार करना चाहिए। चन्द्राष्टक वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि में जब चन्द्रमा हो॥२२॥ तन्नक्षत्रं परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत्। चन्द्राष्टमेशनक्षत्रे त्रितयेषु विशेषतः॥२३॥