भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

३३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

अथवा वह राशि जिन २ नक्षत्रों से बनती है उन २ नक्षत्रों पर जब चन्द्रमा हो तो शुभ कर्म नहीं करना चाहिए। चन्द्रमा से अष्टमेश जिस नक्षत्र पर हो, उससे त्रिकोण के दो नक्षत्र अर्थात् इन तीनों नक्षत्रों पर ।।२३।। आयामव्याधिदुःखानि लभते नात्र संशयः। चन्द्रात्सुखफलात्पिण्डं वर्धयेत्सप्तद्भिभाजयेत् ।।२४।। आयाम- व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है। चन्द्रमा से चौथे स्थान के फल को चन्द्राष्टक वर्ग के पिंड को गुणाकर गुणन फल में २७ का भाग देने से ।।२४।। शेषमृक्षे शनौ याने मातृहानिं विनिर्दिशेत्। तत्त्रिकोणेषु वा केचिन्मातृकष्टं समादिशेत् ।।२५।। शेष तुल्य अश्विन्‍यादि नक्षत्र में शनि के रहने से माता की हानि होती है अथवा उससे त्रिकोण के नक्षत्रों पर शनि के रहने से माता को कष्ट होता है ।।२५।। उदाहरण- जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि में है, उससे अष्टम मकर राशि के स्वामी शनि विशाखा नक्षत्र के चौथे चरण में वृश्चिक राशि में हैं, अतः विशाखा, शतभिषा और पुनर्वसु में आयामादि फल होंगे। चन्द्रमा से चौथे स्थान में फल ३ है, इससे योगपिंड ८७ को गुणने से २६१ हुआ। इसमें २७ का भाग देने से १८ शेष हुआ। अश्विनी से गिनने से १८वाँ ज्येष्ठा नक्षत्र हुआ, अतः ज्येष्ठा नक्षत्र पर जब शनि आयेगा तो माता की हानि होगी। इति चन्द्राष्टकवर्गफलम्। अथ भौमाष्टकवर्गफलम्— भौमाष्टंवर्गे सञ्चिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम्। भौमस्थितस्य सहजो राशिर्भ्रातृगृहं स्मृतम् ।।२६।। भौम के अष्टक वर्ग से भाई, पराक्रम, धैर्य का विचार करना चाहिए। भौम जिस राशि पर हो उससे तीसरी राशि भाई की होती है।।२६।। त्रिकोणशोधनं कृत्वा यत्र भूयांसि वै फलम्। भूमेर्भवति भार्याया भ्रातृगेहसुखं तथा ।।२७।।