बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३९ त्रिकोण-शोधन के उपरान्त जिस राशि के नीचे अधिक फल हों उस राशि पर जब भौम जाता है तब भूमि, स्त्री, भाई और गृह का सुख होता है॥२७॥ भौमो बलविहीनश्चेद्दीर्घायुर्भातृको भवेत्। फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्र भौमे स्थितें क्षतिः॥२८॥ यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होते हैं। जिस राशि में फल शून्य हो उस राशि में भौम के रहते समय भाई को कष्ट होता है॥२८॥ तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्धयेत्पिण्डं च पूर्ववत्। शेषमृक्षं शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ॥२९॥ भौम से तीसरी राशि के रेखा से योगपिंड को गुणाकर २७ से भाग देने से जो शेष नक्षत्र हो उस पर शनि के रहने से भाई को कष्ट होता है॥२९॥ उदाहरण— मंगल कुम्भ राशि में है, उससे तीसरी राशि मेष है, उसमें ३ रेखा है, उससे योगपिंड शून्य ० को गुणाकर २७ का भाग देने से शून्य शेष बचा। अतः रेवती नक्षत्र पर शनि के रहने से वा इससे त्रिकोण (५,९) नक्षत्र पर शनि के रहने से भाई को कष्ट होगा। इसी प्रकार १२ से भाग देने से शेष ० अर्थात् मीन राशि पर अथवा उससे त्रिकोण कर्क, वृश्चिक पर शनि के होने से भाई को कष्ट होगा। इति भौमाष्टकवर्गफलम्। अथ बुधाष्टकवर्गफलम्— बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनमित्रादिमातुलाः। तत्पञ्चमे मन्त्रविद्यालिपिबुद्ध्यादि चिन्तयेत् ॥३०॥ बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा का विचार और उससे पाँचवें भाव में मन्त्रणा, विद्या, लेख और बुद्धि का विचार करना चाहिए॥३०॥ बुधाष्टवर्गं संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ। लभते कुटुम्बकादीनां विनाशं नात्र संशयः॥३१॥ बुधाष्टक वर्ग का संशोधन करके पूर्ववत् योगपिंड द्वारा नक्षत्र एवं राशि का ज्ञान कर कुटुम्बादि के दुःख-सुख आदि को समझना चाहिए॥३१॥