बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४५ स्वस्वाष्टवर्गे यदि वेदहीनाः क्लेशाय सौख्याय च वेदपुष्टाः ।।५७।। और इसके बाद जितनी रेखा हो वह शुभप्रद राशि होती है। उस राशि की दशा में शरीर का सुख, यश और धन का विशेष लाभ होता है। अपने-अपने अष्टकवर्ग में जिस राशि में ४ से कम रेखा होती है वह राशि कष्टप्रद और ४ से अधिक रेखावाली राशि सुखप्रद होती है।।५७।। दशमभवनरेखाभ्योऽधिकं लाभमानं भवति यदि विहीनं स्याद्व्ययाख्यं ततोऽपि। अधिकतरविलग्नं भोगसम्पत्तिभूयः विनिमयवशतस्तद्वैपरीत्यं जनस्य।।५८।। दशम भाव की रेखा से अधिक लाभ भाव में रेखा हो और लाभ भाव से अल्प द्वादशभाव में तथा इससे अधिक लग्न भाव में रेखा हो तो वह जातक अधिक धन-संपत्तिवाला होता है। यदि इससे विपरीत हो तो विपरीत फल होता है।।५८।। प्राग्दाक्षिण्यादिभानां सकलफलयुतिं दिक्चतुष्कक्रमेण कृत्वा तद्भागतो यः समधिकफलतः शोभनं हानिमल्पात्। सौम्याः स्वोच्चस्वगेहोदितखचरयुते दिग्विभागे स्वकार्ये वित्तेशाशासु वित्तं मृतिपतिगतदिग्भागगे देहनाशः ।।५९।। लग्नादि भावों को प्राग्दक्षिण क्रम से अर्थात् लग्न, द्वादश, एकादश भाव की पूर्वदिशा; दशम, नवम, अष्टम भाव की दक्षिणदिशा; सप्तम, षष्ठ, पंचम भाव की पश्चिम दिशा और चतुर्थ, तृतीय और द्वितीय भाव की उत्तर दिशा कल्पना करें। दिशा के प्रत्येक भावों की रेखाओं का योग करके एकत्र रख दे। जिस दिशा में अधिक रेखा हो और उसमे शुभग्रह युत हों, अपनी उच्च राशि में हों तो उस दिशा से धन का लाभादि होता है। धनेश की दिशा से धन का लाभ और अष्टमेश की दिशा में शरीर में क्लेश होता है, यह यात्रा में देखना चाहिए।।५९।। अथ भावफलम्- भावं विलोक्य सदसत्फलदायकंयत्तद्राशिसम्भवफलैश्चतदुक्तपिण्डम्। पिण्डेरेखाताडिते भावशेषे राशौ यदायाति सौरिः समायाम्।।६०।।