बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उदाहरण- लग्न से शनि पर्यन्त क्रम से ६+१+३+७+३+४+२+१+२=२९ रेखाओं का योग २९ हुआ। तत्तुल्य वर्ष अर्थात् २९वें वर्ष में शरीर में व्याधि, विदेशयात्रा, धन की हानि होगी एवं शनि से लग्न पर्यन्त रेखाओं के योग ४+५=९ तुल्य वर्ष में पूर्ववत् कष्ट आदि फल होगा। दोनों के योग तुल्य ३८वें वर्ष में पूर्ववत् कष्ट आदि फल होंगे। अथवा शनि के योगपिंड ६७ को लग्न से आठवें भाव की रेखा संख्या ५ से गुणने पर ३३५ हुआ। इसमें २७ का भाग देने पर शेष ११ हुआ, अश्विनी से गिनने से पूर्वाफाल्गुनी वा इससे त्रिकोण स्वाती, मूल नक्षत्र पर जब शनि होंगे तो कष्ट होगा। लग्न से शनि पर्यन्त रेखा की संख्या २९ इसे ७ से गुणने से २०३ हुआ। इसमें २७ का भाग देने से शेष १४ के तुल्य चित्रा नक्षत्र हुआ। इस पर पापग्रह के रहने से धन-सुख की हानि होगी। इति शनेरष्टकवर्गफलम्। सर्वाष्टकवर्ग (समुदायाष्टकवर्ग) फलम्- सर्वाष्टकग्रहफलैश्च नियोज्यचक्रं मूर्त्यादिभावमशुभं शुभमेव तत्र। जन्मादितः फलसमानदशा समीक्ष्य यात्राविवाहसमये बहुमूलयुक्ता।।५५।। सभी ग्रहों के अष्टक वर्ग की रेखाओं के योग से सर्वाष्टक वर्ग बनता है (पृ. ३१८ में देखिए)। इसमें लग्न से द्वादश भाव की राशियों को देखना चाहिए। जिस राशि में रेखा अधिक हो उसकी दशा में यात्रा, विवाह आदि करने से अधिक शुभफल होता है।।५५।। मेषादिभानां सकलाष्टवर्गे उत्पन्नरेखागणमेवं कुर्यात्। धृत्यादि तत्त्वान्तमितं कनिष्ठं त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः।।५६।। सर्वाष्टकवर्ग में जिस राशि में १८ से कम रेखा हों वह कष्टप्रद और २५ तक रेखा हो तो कनिष्ठ फल, ३० पर्यन्त मध्यफल।।५६।। त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः शरीरसौख्यार्थयशो विशेषाः।