भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 800 में से

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अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४३ अष्टमस्य फलैर्हत्वा सप्तविंशतिभाजितम् । शतादूर्ध्वं तत्पिण्डं शतमेवाग्रतस्त्यजेत् ।।४९।। दोनों के योग तुल्य वर्ष में मृत्युयोग वा व्याधि आदि फल होते हैं। शनि के त्रिकोणादि शोधन से उत्पन्न योगपिंड लग्न से अष्टम स्थान के फल से गुणाकर २७ से भाग देने पर शेष १०० से अधिक बचे तो उसमें से १०० घटाकर शेष तुल्य आयु होती है।।४९।। आयुःपिण्डं तु जानीयात्प्राग्वद्वेलां तु कल्पयेत् । त्रिकोणैकाधिपत्यादि शोधनं विरचय्य च ।।५०।। पिण्डं संस्थाप्य गुणयेल्लग्नादष्टमगैः फलैः । सप्तविंशतिहृच्छेषं मृत्युकालं वदेद्बुधः ।।५१।। समूलाष्टकवर्गे च यत्र नास्ति फलं गृहे । तत्र नास्ति फलं तस्य यदायाति शनैश्चरः ।।५२।। इस प्रकार आयुपिंड को जानकर समय का निश्चय करे। एकाधिपत्य आदि शोधन बनाकर शनि के सम्पूर्ण अष्टकवर्ग में जिस राशि का फल न हो अर्थात् शून्य हो तो उस राशि में जब शनि होता है तो उसका कोई फल नहीं होता है।।५०-५२।। तद्गृहे रविचन्द्रौ चेद्दशाछिद्रे मृतिं वदेत् । दशाछिद्रसमायोगे मृत्युरेव न संशयः ।।५३।। तथा उस राशि में जब सूर्य-चन्द्र होते हैं और अनिष्टकारी दशा होती है तो मृत्यु होती है, इसमें सन्देह नहीं।।५३।। विलग्नशनिमध्यगानि च फलानि सन्ताडयेन्नगै- र्भाविहतानि शेषमितर्क्षे खले याति चेत् । तदा धनसुखक्षतिं तदनु चाङ्गभादष्टमस्थितै- र्विगुणयेत्पिण्डं भपरिशेषभस्थे शनौ ।।५४।। लग्न से शनि पर्यन्त फलों को सात ७ से गुणांकर २७ से भाग देने पर शेष तुल्य नक्षत्र पर पापग्रह के रहने से सुख की हानि होती है। लग्न से अष्टम स्थान के फल से शनि के योगपिंड को गुणाकर २७ का भाग देने से शेष तुल्य नक्षत्र अथवा कोण नक्षत्र (५।९) पर शनि के होने से सुख-धन की हानि होती है।।५४।।

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