भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

३४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् शुक्र के नवांश के सदृश वर्ण-रूप-गुण के युक्त वा चन्द्रमा के नवांश सदृश वा सप्तमेश के गुण के अनुरूप स्त्री होती है।।४२।। शुक्रान्मन्दे त्रिकोणस्थे नेष्टं जीवे सुखप्रदम्। तेषां बलविवेकेन भार्याया लक्षणं वदेत् ।।४३।। शुक्र से शनि त्रिकोण में हो तो स्त्री का सुख नहीं होता है और गुरु हों तो स्त्री का सुख होता है। इनके बल के अनुसार ही स्त्री के सुख- दुःख का विवेचन करना चाहिए।।४३।। शुक्राज्जामित्रफलैः संवर्ध्य पिण्डञ्च पूर्ववत्। स्त्रियः दुःखं सुखं ज्ञेयं पूर्वरीत्यनुसारतः।।४४।। शुक्र से सातवें भाव के फल को पूर्ववत् शुक्र के योगपिंड से गुणा कर गुणनफलं में २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र पर जब शनि जावे तो स्त्री को कष्ट कहना।।४४।। इति शुक्राष्टकवर्गफलम्। अथ शन्यष्टकवर्गफलम्— शनैश्चरस्थितस्थानादष्टमं मृतिरुच्यते। शनेरष्टकवर्गे च स्वस्यायुष्यं विनिर्दिशेत् ।।४५।। शनि जिस भाव में हो उससे आठवें स्थान में आयु का विचार करना चाहिए।।४४।। लग्नात्प्रभृति मन्दान्तं फलान्येकत्र कारयेत्। लग्नादिफलतुल्याब्दे व्याधिवैरं समादिशेत् ।।४६।। लग्न से आरम्भ कर शनि पर्यन्त रेखाओं का योग करे। योग तुल्य वर्ष में शरीर में व्याधि और लोगों से वैर, विदेश यात्रा, धन की हानि होती है।।४६।। मन्दाद्विलग्नपर्यन्तं फलान्येकत्र संयुतम्। मन्दादिफलतुल्याब्दे व्याधिं तस्य समादिशेत् ।।४७।। शनि से लग्न पर्यन्त रेखाओं का योग करे। योग तुल्य वर्ष में पूर्व के तुल्य ही वर्ष में व्याधि आदि फल होते हैं।।४७।। तयोर्योगसमाङ्के तु मृत्युयोगं प्रचक्षते। शोध्यादि गुणनं कृत्वा पिण्डं संस्थाप्य यत्नतः ।।४८।।