बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४७ विशेष- जैसे सर्वाष्टकवर्गचक्र में- राशयः फलानि योगः (१) - १२+१+२+३=३२+४२+३२+३८=१४४ (२) ४+५+६+७=२५+३२+२६+२९=११२ (३) ८+९+१०+११=३७+३४+३४+२९=१३३ ३८९ प्रथम अवस्था में १४४ रेखा है, अतः प्रथम अवस्था सुखमय व्यतीत होगी। क्योंकि लग्न सहित सप्तग्रहों की सम्पूर्ण रेखाओं का योग ३८९ है, इसका खंडत्रय करने से १२९ होता है। इससे अल्प रेखा में कष्ट आदि की संभावना होती है। इसी प्रकार युवावस्था में ११२ रेखा है, अतः कुछ कष्ट से व्यतीत होगा। वृद्धावस्था में १३३ रेखायें हैं, अतः वृद्धावस्था सुखमय व्यतीत होगी। अथ राहुयुक्तगुरुफलम्- राहुयुक्तगुरुराशिगे गुरौ तत्त्रिकोणमथ रिष्टकारकम्। अल्पमृत्युरिपुभावनाथको योगकृत्तदिह मृत्युसम्भव ।।६४।। राहु से युक्त गुरु की राशि में गुरु हो अथवा उससे त्रिकोण की राशि में हो तो अरिष्टकारक होता है। यदि षष्ठेश योग करता हो तो मृत्यु होती है॥६४॥ अथ निधनार्कमाह- मृत्युपद्वादशांशत्रिकोणेऽसुरो मृत्युनाथत्रिकोणस्थसूर्ये मृतिः। अर्कलिप्ताहतो राहुलिप्तागणश्चक्रलिप्ताप्तयुक्तो रविर्मृत्युदः॥६५॥ अष्टम स्थान का स्वामी जिस द्वादशांश में हो उससे त्रिकोण राशि में जब राहु जाये तो उससे (अष्टमेश राशि के) त्रिकोण राशि में सूर्य के जाने से मृत्यु होती है। सूर्य की कला-विकला को राहु की कला-विकला से गुणाकर गुणनफल में चक्रकला (२१६००) से भाग दें, जो लब्ध हो उसे सूर्य की कला में जोड़ दें। उसका राश्यादि बनावे, उसके तुल्य सूर्य जिस मास में हो उस मास में मृत्यु होती है॥६५॥ भौममार्त्तण्डलिप्ताहतिः कारयेच्चक्रलिप्ताहताल्लब्धयुक्तो रविः। यातियस्मिंस्तदात्तत्त्रिकोणेऽपिवाक्लेशमाहुःक्षयंमासिधीमान्वदेत्।। भौम की कला को सूर्य की कला से गुणा कर दे, गुणनफल में २१६०० से भाग दें, लब्ध को सूर्य की कला में जोड़ दे। योगफल का राश्यादि