भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 800 में से

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पृष्ठ 348

३५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जिस राशि में १५ रेखाएँ हों उस मास में राजभय की संभावना होती है। इसकी शान्ति के लिए हाथी का दान करना चाहिए। जिस राशि में १६ रेखा हों उस मास में कष्ट होता है। इसकी शान्ति के लिए कल्पतरु की प्रतिमा का दान करे।।७५।। ऋषिचन्द्रैर्व्याधिभयं गुडधेनुं निवेदयेत्। कलाहोऽष्टेन्दुभिर्दद्याद्रत्नगोभूहिरण्‍यकम् ।।७६।। जिस राशि में १७ रेखा हों उस मास में व्याधि का भय होता है। उसके शान्त्यर्थ गुड़ के धेनु का दान करें। जिस राशि में १८ रेखा हों उस मास में कलह होने का भय होता है। उसकी शान्ति के लिए गौ, भूमि, रत्न और सुवर्ण का दान करना चाहिए।।७६।। देशत्यागोऽङ्कचन्द्रैः स्याच्छान्तिं कुर्याद्विधानतः। विंशत्या बुद्धिनाशः स्यात्कुर्याल्लक्षमितं जपम्।।७७।। जिस राशि में १९ रेखा हों उस मांस में देश के त्यागने का भय होता है। इसकी शान्ति के लिए विधिपूर्वक शान्ति करनी चाहिए। जिस राशि में २० रेखा हों उस मास में बुद्धि का नाश होता है। इसकी शान्ति के लिए १ लक्ष जप करना चाहिए।।७७।। भूमिपक्षै रोगपीडा दद्यात् धान्यस्य पर्वतम्। यमाश्विभिर्बन्धुपीडा दद्यादादर्शकं बुधः।।७८।। जिस राशि में २१ रेखा हों उस मास के रवि में रोग और पीड़ा होती है। उसकी शान्ति के लिए धान्य का पर्वत देना चाहिए। जिस राशि में २२ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं को पीडा होती है। उसकी शान्ति के लिए आदर्श (ऐनक) का दान करना चाहिए।।७८।। रामपक्षयुते मासे नानाक्लेशान्प्रपद्यते। सौवर्णीं प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैः क्रमात्।।७९।। जिस राशि में २३ रेखा हों उस राशि के रवि में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं। उसकी शान्ति के लिए सूर्य की सोने की सात तोले की प्रतिमा देनी चाहिए।।७९।। वेदाश्विभिर्बन्धुहीनो दद्याद्गोदानकं दश। सर्वरोगादिनाशार्थं जपहोमादि कारयेत्।।८०।। जिस राशि में २४ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं का नाश होता है। उसके शान्त्यर्थ १० गोदान करना चाहिए और सभी रोगों के शान्त्यर्थ जप-होम आदि करना चाहिए।।८०।।