बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५३ शङ्कर उवाच- साधु पृष्टं त्वया देवि कथयामि सविस्तरात् । शृणुष्वैकमना भूत्वा बलाबलवशादपि ॥३॥ शंकरजी ने कहा- तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है। हे देवि ! मैं उसे विस्तार से कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त से सुनो ॥३॥ ज्ञेयं सुनिश्चितं सर्वं राशिचक्रे विशेषतः। मेषादि मीनपर्यन्तं मूर्त्यादिद्वादशक्रमात् ॥४॥ यह सब राशिचक्र में निश्चित है ॥४॥ भावं च भावजं ज्ञात्वा फलं ब्रूयाद्विचक्षणः। तनुर्वित्तं बन्धुमातृपुत्रशत्रुस्मरो मृतिः ॥५॥ मेषादि राशियों के बारह भाव तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु ॥५॥ पितृकर्म च लाभं च व्ययान्ता भावसंज्ञकाः। गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च ॥६॥ धर्म, कर्म, आय और व्यय होते हैं। इसमें गुरु, लग्नेश, दारेश और पंचमेश ॥६॥ सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता। रव्यारराहुशनयः पुत्रस्था बलसंयुताः। कारकाख्यात्क्षीणबलादनपत्यत्वमादिशेत् ॥७॥ ये सभी निर्बल हों तो अनपत्य योग होता है। सूर्य, भौम, राहु, शनि पुत्रस्थान में हों और बली हों तथा पुत्रकारक (गुरु) निर्बल हो तो अनपत्य (निःसन्तान) योग होता है ॥७॥ अथ शापज्ञानमाह- पुत्रस्थानगते राहौ कुजेनापि निरीक्षिते। कुजक्षेत्रगते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥८॥ यदि पाँचवें भाव में राहु हो तथा भौम से देखा जाता हो अथवा भौम की राशि में हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है॥८॥ पुत्रेशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने। चन्द्रदृष्टे युते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥९॥