भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

३६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् एवं कृते तदा देवि शापान्मोक्षो भविष्यति । सत्पुत्रं लभते पश्चाद्वृद्धिः स्यात्तस्य सन्ततेः ॥४९॥ ऐसा करने से शाप से मुक्ति मिल जाती है और अच्छे पुत्र का लाभ होता है तथा संतान की वृद्धि होती है॥४९॥ अथ भ्रातृशापात्सुतक्षययोगः- भ्रातृस्थानाधिपे पुत्रे कुजराहुसमन्विते । पुत्रलग्नेश्वरौ रन्ध्रे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५०॥ भ्रातृस्थान (३) के स्वामी भौम-राहु से युत होकर पाँचवें भाव में हों और पंचमेश, लग्नेश आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५०॥ लग्ने सुते कुजे मन्दे भ्रातृपे भाग्यराशिगे । कारके नाशराशिस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५१॥ लग्न पंचम भाव में भौम-शनि हों, भ्रातृभावेश भाग्य भाव में हो तथा कारक (भौम) आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५१॥ भ्रातृस्थाने गुरौ नीचे मन्दः पञ्चमगो यदि । नाशस्थौ तु चन्द्रारौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५२॥ भ्रातृस्थान (३) में नीच राशि में गुरु हो और शनि पाँचवें भाव में हो और आठवें भाव में चन्द्र-शनि हों तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५२॥ मूर्त्तिस्थानाधिपे रिःफे भौमः पञ्चमगो यदि । पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५३॥ लग्नेश बारहवें भाव में, पंचम भाव में भौम हो और पंचमेश आठवें भाव में हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५३॥ पापमध्यगते लग्ने सुतभे पापमध्यगे । नाथौ च कारकौ दुःस्थौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५४॥ पापग्रह के मध्य में लग्न हो और पंचम भाव भी पापग्रह के मध्य में हो, दोनों के स्वामी और कारक ६, ८, १२ भाव में हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५४॥